भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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भुवनकोशः ६९ कहा जाता है जिसके आदि में भारत वर्ष कहा जाता है । भारत वर्ष के उत्तर में किन्नर वर्ष तदुत्तर में हरिवर्ष है । इसी प्रकार सिद्धपुर (दक्षिण अमेरिका के उत्तर में शृङ्गवान नाम का पर्वत) उसके उत्तर में श्वेत गिरि और तदुत्तर में नीलगिरि नामक पर्वत हैं जो प्रागपरयाम्योत्तर में समुद्रों से मिले हुये हैं। इन देशों पर्वतों और समुद्रों के बीच में उत्तरोत्तर कुरु वर्ष, हिरण्मय और रम्यक वर्ष स्थित हैं । इसी निरक्ष देशीय पूर्व स्वस्तिकधरातलीय स्थित यमकोटि नगर के उत्तर में माल्य- वान् नामक पर्वत निषध और नील पर्वत तक दीर्घ विस्तृत कहा गया है । नीलगिरि और समुद्र के बीच में भद्राश्व वर्ष, इसी प्रकार रोमक के उत्तर में गन्धमादन, गन्धमादन और समुद्र के मध्य में केतुमाल, नामक प्रदेश है । निषध, नील, माल्यवान्, गन्धमादन, ऐरावत, इलावृत्त नामों से इस प्रकार ९ प्रकार की भूखण्डों की संज्ञा कही गई है। भूमण्डल के नवम खण्ड को स्वर्ग भूमि भी कहा गया है जिसे देव क्रीडा घर भी कहते हैं ॥२६॥२७॥२८॥२९॥३०॥ इदानीं मेरुसंस्थानमाह— इह हि मेरुगिरिः किल मध्यगः कनकरत्नमयस्त्रिदशालयः । द्रुहिणजन्मकुपद्मजकर्णिकेति च पुराणविदोऽमुमवर्णयन् ॥३१॥ विष्कम्भशैलाः खलु मन्दरोऽस्य सुगन्धशैलो विपुलः सुपार्श्वः । तेषु क्रमात्सन्ति च केतुवृक्षाः कदम्बजम्बूवटपिप्पलाख्याः ॥३२॥ जम्बूफलामलगलद्रसतः प्रवृत्ता जम्बूनदी रसयुता मृदभूत् सुवर्णम् । जाम्बूनदं हि तदतः सुरसिद्धसंघाः शश्वत्पिबन्त्यमृतपानपराङ्मुखास्तम् ॥३३॥ वनं तथा चैत्ररथं विचित्रं तेष्वप्सरोनन्दननन्दनं च। धृत्याह्वयं यद्धृतिकृत्सुराणां भ्राजिष्णु वैभ्राजमिति प्रसिद्धम् ॥३४॥ सरांस्यथैतेष्वरुणं च मानसं महाह्रदं श्वेतजलं यथाक्रमम् । सरःसु रामारमणश्रमालसाः सुरा रमन्ते जलकेलिलालसाः ॥३५॥ सद्रत्नकाञ्चनमयं शिखरत्रयं च मेरो मुरारिपुरारिपुराणि तेषु । तेषामधः शतमखज्वलनान्तकानां रक्षोम्बुपानिलशशोशपुराणि चाष्टौ ॥३६॥ वा० भा०—तस्येलावृतस्य मध्ये कनकरत्नमयो मेरुगिरिः कर्णिकाकारस्तदेव देवानामालयम् । तत्र मेरावुपरि शिखरत्रयम् । तेषु शिखरेषु मुरारेर्ब्रह्मणः पुरारेश्च पुराणि सन्ति । शिखराणामधः समन्तादिन्द्रादिलोकपालानां पुराणि

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