सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्रापि" -> "पूर्वापरयोर्व्यत्यासात्" (has repha on 'व्य').
Line 32: "दिशामवगमाद्दक्षिणोत्तरयोरभिन्नत्वदुक्तार्थे न काचित्क्षतिरिति भावः ।।४४।।" Wait, "भिन्नत्वदुक्तार्थे" -> 'भिन्नत्वात्' + 'उक्तार्थे' = 'भिन्नत्वादुक्तार्थे'? Look at the text: 'दिशामवगमाद्दक्षिणोत्तरयोरभिन्नत्वदुक्तार्थे' -> is there an aa-matra on 'त्व'? Look at 'त्व': no aa-matra! It is 'त्वदुक्तार्थे'! Wait, look at 'काचित्क्षतिरिति': 'का' 'चि' 'त्' 'क्ष' 'ति' 'रि' 'ति'. Then "भावः ।।४४।।" (two dandas, 44, two dandas).
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Header: Left: ८० Center: गोलाध्याये
Lines of main text: मध्याह्नम् । तस्मिन्नेव काले । अधो लङ्काया ऊर्ध्वत्वकल्पनया तदधोभागस्थितसिद्ध- पुरावच्छिन्नभूगर्भेऽस्तकालः । कालपदोपादानादेक एव कालस्तत्त