सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें· स याति परमां गतिम् । मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाऽऽप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः । अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं ममेति । चकारोऽन्य उक्तातिरिक्तः प्रलयो नास्तीति सूचकः । महाप्रलयश्च सर्वजन्तूनां मुक्तिः । सा तु न कदाऽप्यनीदृशं जगदित्याद्युक्त्या शास्त्रान्तरे निरस्तैवेत्यु- पसंहारव्याजेनेनाऽऽह —इतीति । इत्युक्तप्रकारेण । लयः प्राणिनाशश्चतुर्धा चतुर्भेदात्मकः । अचेतनविनाशस्त्वेकरूप एव । भास्कराविरोधिनस्तु —नगशिलीमुखबाणभुजंगमज्वलनवह्नि- रसेषुगजाश्विन इत्यनेन व्यासः १०५० परिधिः ३२९८ । ४०४८ । घातरूपश्च (च) क्राङ्गवह्निरसवेदगुणमितं पृष्ठफलमुक्तं न त्वन्यत् । तथा हि—नगेषु पर्वतेषु । शिलीमुखः सायकः । करवालो वज्रमिति यावत् । न पतति यस्येति नगशिलीमुखः । पर्वतशत्रुरिन्द्र इत्यर्थः । बाणाद्भवतीति बाणभूः । स चासौ जङ्गमश्च प्राणिविशेषः स्वामिकार्तिकेयस्तस्य ज्वलनं मुखं देवमुखत्वेन वह्नेः प्रसिद्धेः । स्वामिकार्तिकेयस्य देवत्वावगमार्थं मुखवाचकं ज्वलनपदं लक्षणया दत्तम् । तस्य षडाननत्वेन प्रसिद्धेः षट्संख्या वह्निरसेति यथाश्रुतम् । इषुवद्गच्छतीति इषुवायुस्तस्माज्जातो मेघः । धूमज्योतिः सलिलमरुतां संनिपातो हि मेघ इति कालिदासोक्त्या पञ्चमहाभूतमयत्वेन वायोरधिकभागत्वात् । मेघपदेन सप्तदशसंख्या प्रसिद्धा । तया गुणिता । अश्विनौ द्वयमिति मध्यपदलोपिसमासादिषु गजाश्विनश्चतुस्त्रिंशत् । अतो दुष्टं कन्दुकपृष्ठजालवदित्यादि ल्यब्चतुर्थ्यन्तं ग्रन्थो व्यर्थ इत्याहुस्तन्न । पदार्था- नामसंगतत्वाद्व्वाणभूजङ्गमइति दीर्घत्वापत्तेश्च ॥६५॥ केदारदत्तः—पृथ्वी के बहुत प्रकार के प्रलय भेदों का व्याख्यान किया जा रहा है— प्राणियों के विनाश का नाम भी प्रलय है जो प्रतिदिन में प्रतिक्षण भी होता रहता है इस प्रलय का नाम दैनन्दिनीय प्रलय है । ब्रह्मा के एक दिनान्त में अर्थात् चतुर्युगीय एक महायुग मापक १००० महायुगों के १ ब्रह्मादिनान्त में जो प्रलय होता है उसे ब्राह्म दिनान्त का प्रलय कहते हैं । इस प्रलय में क्षीण पाप पुण्य का समग्र लोक ब्रह्म शरीर में प्रविष्ट हो जाता है । इस प्रकार ब्रह्म दिनान्त के अनन्तर ब्रह्म की रात्रि शेष में पुनः सृष्टि का निर्माण होता है और ब्रह्मा के मुखादि अंगों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रान्त्यजादि की पुनः उत्पत्ति होती है । ब्रह्म दिनारम्भ में एक योजन मात्र भूमि के विस्तार की जो वृद्धि होती है उसी का प्रलय होता है । तथा अपने मान के दिन मास वर्षों में ब्रह्मा की शतायु प्रमाण वर्षों की पूर्ति समय में यह सारी पृथ्वी-एवं ब्रह्माण्ड के सभी ग्रह नक्षत्रादिक पिण्डों का विनाश हो जाता है, यही महाप्रलय कहा जाता है । अर्थात् पञ्च भौतिक पिण्डों में पृथ्वी का जल में, जल का तेज (विद्युत) में, तेज का वायु में, वायु का आकाश में, आकाश का अहङ्कार में, अहङ्कार का महत्तत्त्व में, और महत्तत्त्व का पूर्ण प्रकृति में अर्थात् अव्यक्त में प्रलय हो जाता है ।