सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ गोलाध्याये मर्धज्या तन्मापकेन त्रिज्या तन्मापकेनैव गणयित्वा ज्ञेयमेवं स्वेच्छयाऽभीष्टांशानां सूक्ष्मज्या सिध्यतीति ॥ ६ ॥ केदारदत्त:— किसी समान भूमि में अर्थात् जल आदि से समतल कृत भूमि धरातल में अभीष्ट अंगुल व्यासार्ध रेखा से एक वृत्त बना कर उस वृत्त में पूर्व पश्चिमादि दिक् चिह्न लगाकर उस वृत्त में, ३६० अंश, पुनः एक-एक अंश में ६० विकला····के स्थान अङ्कित करने चाहिए। इस प्रकृत वृत्त के चार चतुर्थांश में ९०° होंगे। एक चतुर्थांश चाप में जितनी जीवा करनी है उस चतुर्थांश चाप के उतने अभीष्ट विभाग करने चाहिए। गणिताचार्यों ने एक वृत्त के धनु अंश में २४ विभागों की कल्पना की है अतः इस आधार से (९०° × ६०) / २४ = २२५ कला का एक चाप होता है। प्रत्येक अभीष्ट चिह्नगत सरल रेखा का नाम ज्या होता है। इस प्रकार २४ संख्यक ज्या होती हैं जिनका ज्यार्ध नाम भी होता है। सोपपत्तिक व्याख्या— किसी भी वृत्त खण्ड की इष्ट त्रिज्या कर्ण, भुजज्या = भुज कर्ण और भुज का वर्गान्तर मूल = कोटि होती है। क्षेत्र देखें— अ क ल प ह म न ट र ल स वृत्त का चतुर्थांश वृत्त = अ ह। अभीष्ट चाप = अ प की ज्या सरल रेखा = प य = केत = भुज। चाप अ ह – चाप अ प = चाप प ह = कोटि चाप की ज्या = प त = कोटि। केन्द्र से परिधि तक की केप रेखा = कर्ण। अतः के त² + त प² = के प² तथा = के प² - प त² = के त² = भुज ज्या²