सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ गोलाध्याये वर्द्धित उच्च और कक्षा वृत्तस्थ रेखाएँ जहाँ प्रतिमण्डल में लगती हैं उन बिन्दुओं का नाम प्रतिमण्डलीय उच्च = उ' एवं प्रतिमण्डलीय ग्रह = ग्र संकेत से समझना चाहिए । प्रति मण्डलीय उच्च बिन्दु से विलोम से उच्च राशिमान दान देकर मेषादि का ज्ञान भी प्रतिमण्डल में करते हुए इस वृत्त में मेषादि से मध्यम ग्रह चिह्न ज्ञात करना चाहिए । ग्रह और उच्च का अन्तर = केन्द्र ग्रह से उच्च रेखा तक गत रेखा का नाम भुजाकार प्रतिमण्डलीय उच्च रेखागत लम्बरूपिणी तिर्यक् रेखा से ग्रह तक की ऊर्ध्व रेखा का नाम कोटिज्या है । उपपत्ति—क्षेत्र देखिये— भू भूकेन्द्र से त्रिज्या व्यासार्ध वृत्त = उ स नी ग्रह कक्षा केन्द्र प्र से त्रिज्या व्यासार्ध वृत्त = उ' स नी' स अपनी कक्षा में गणितागत मध्यम ग्रह = म भूगर्भ से ग्रह कक्षागत ग्रह कर्ण सूत्र का त्रिज्याव्यासार्धीय वृत्त के साथ सम्पात बिन्दु में स्पष्ट ग्रह । म ग्र से भू केन्द्रगत तिर्यक् त्रिज्या रेखा की समानान्तर रेखा = म' ज = ह भू । कक्षा वृत्तस्थ स्प ग्र = स्पष्ट ग्रह । म' = मध्यम ग्रह । म' स्प = म स्प' = कक्षावृत्त में फल चाप । मध्य केन्द्रज्या और स्पष्ट केन्द्रज्या का अन्तर = फल ज्या = चाप फल । वही पदार्थ अपेक्षित है जिसे मन्द प्रतिवृत्त सम्बन्ध से मन्द फल और शीघ्र प्रतिवृत्त सम्बन्ध से शीघ्रफल कहा गया है ॥१०॥११॥१२॥१३॥१४॥ इदानीं फलानयन इतिकर्त्तव्यतोपपत्तिमाह— मध्यस्थरेखे किल वृत्तयोर्ये तदन्तरालेऽन्त्यफलस्य जीवा । तदूर्ध्वतः कोटिगुणो मृगादौ कर्क्यादिकेन्द्रे तदधो यतः स्यात् ॥१ ५