सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० गोलाध्याये वृत्तस्थग्रहभोगः फलादेशार्थमनुपयुक्तः । दृक्सूत्रं तु कर्ण एव । तत्साधनार्थं स्पष्टा कोटिः कॢप्ता । यद्यपि भूगर्भे मनुष्याणामभावस्तथाऽपि पृष्ठसमसूत्रसंबंधेन तद्भूगर्भे तेषामव- स्थानान्न क्षतिः । फलस्वरूपमाह— फलमिति । चकारस्त्वर्थः । तेन फलमित्यस्यान्वय उत्तरत्र सुबोधः । कक्षावृत्तस्थमध्यस्फुटग्रहचिह्नयोर्मध्येऽन्तराले कक्षावृत्तपरिध्येकदेशे । फलस्य तद्धनर्णतास्वरूपमाह— मध्य इति । कक्षावृत्ते स्फुटग्रहस्थानान्मध्यग्रहचिह्ने । अग्रे राशिक्रमानुरुद्धमार्गेणाग्रिमभागस्थे तत्फलमृणं ततस्तस्मिन्मध्यग्रहभोगे क्रियते । पश्चिम- भागस्थे धनं क्रियते । चकारादुक्तरीत्यैव मन्दफलं शीघ्रफलं मेषादितुलादिकेन्द्र ऋणधनं धनर्णं स्पष्टाधिकारोक्तं सिद्धमित्यर्थः ॥१५॥१६॥१७॥ केदारदत्तः—कक्षावृत्त और मन्दप्रतिवृत्त की केन्द्रगत पूर्वापरा दोनों रेखाओं का लम्ब रूप अन्तर का नाम अन्त्यफल ज्या होता है । मकरादि केन्द्र में कोटिज्या ऊर्ध्वगत एवं कर्कादि केन्द्र में अधोगत होती है । अन्त्य फलज्या और मध्य कोटिज्या का मृग कर्णादि केन्द्र वश योगान्तर स्पष्टा कोटि होती है । स्पष्टा कोटि और भुजज्या का वर्गान्तर मूल कर्ण मान होता है । कर्णाग्र में भूमध्य से प्रतिमण्डलस्थ मध्यमग्रह तक गई रेखा का नाम ग्रह कर्ण होता है । कक्षावृत्त कर्णसूत्र के सम्पात गत बिन्दु पर स्पष्ट ग्रह दृश्य होता है । कक्षावृत्तस्थ मध्यम स्पष्ट ग्रहों का अन्तर चाप मान फलचाप और फलज्या होता है । मध्यम ग्रह से स्पष्ट ग्रह आगे रहने से फल धन एवं मध्यम ग्रह से स्पष्ट ग्रह की पश्चिम पश्चात् की स्थिति से फल ऋण होता है । उपपत्ति—क्षेत्र दर्शन से अतिसुस्पष्ट है । प्रतिवृत्त में मृगादि कर्कादि केन्द्र से म, या म॑ = मध्यमग्रह स्प या स्प॑ = स्पष्ट ग्रह । भूगर्भ से मध्यम ग्रह म, म॑ तक गया सूत्र = भू म या भू म॑ = कर्ण सूत्र है । मृगादि केन्द्र में म त + तह = मह = स्पष्टा कोटि कर्कादि केन्द्र में म॑ट—टय = म॑ य = स्पष्टा कोटि मह² = ह भू² + भू म॑ अथवा म य² + भू य² = कर्ण² का मूल = भू म, या भू म॑ = कर्ण का मान ज्ञात करते हुए— स्पष्टा केन्द्रज्या × अन्त्य फलज्या ─────────────────────────────── = स्पष्ट फलज्या का चाप कर्ण = म॑ स्प अथवा म स्प॑ = होता है जो सम्यगुणपन्न होता है ॥१५॥१६॥१७॥ इदानीं मन्दस्फुटं मध्यमं प्रकल्प्य शीघ्रफलं यत्साध्यते तदुपपत्तिमाह— मध्यो हि मन्दप्रतिमण्डले स्वे मन्दस्फुटो द्राक्प्रतिमण्डले च । भ्रमत्यतश्चञ्चलकर्मणीह मन्दस्फुटो मध्यखगः प्रकल्प्यः ॥१८॥ वा० भा०—मन्दकर्मपूर्वकं शीघ्रकर्मेत्येतत्स्पष्टार्थम् ॥१८॥