सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३ ) वह कौन सा वर्ग है जिसे १३ से गुणा कर १ जोड़ देने से प्राप्त अंक का मूल मिल जाता है । प्रकृति १३ है । जो (२)² + (३)² = ४ + ९ दो वर्गाङ्कों को योग तुल्य है अतः प्रश्न सही है । दोनों वर्गाङ्कों ४, ९ के मूलों २, ३ से १ में भाग देने पर ऋण १ में कनिष्ठ पद = १/२, अतः १/२ का वर्ग = १/४ को प्रकृति १३ से गुणा करने पर १/४ × १३ = १३/४ इसमें ऋण १ क्षेप कम करने से १३/४ - १ = ९/४ का मूल ३/२ यह ज्येष्ठ का मान है । इष्ट ३ से १ में भाग देने से १/३ कनिष्ठ, १/३ का वर्ग = १/९ को १३ से गुणा करने पर १३/९ में ऋण १ कम करने से ४/९ का मूल = २/३ यह ज्येष्ठ का मान भी होता है । अथवा कनिष्ठ १ के वर्ग को १३ से गुणा कर ४ कम कर मूल लेने से क० = १, ज्ये० ३, क्षे० ४, यहाँ पर इष्ट = यदि २ का वर्ग = ४ अतः क ३/२ ज्ये० ३/२, क्षे० = - १ । यदि प्रकृति १३ में - ९ = ४ का मूल २ से १ में भाग देने से क० १/२, ज्ये० ३/२, क्षे० - १ कुट्टक रीति से भाज्य = १ हा० = - १, क्षे० = ३/२ तीनों में ३/२ का अपवर्तन देने से भा० = १, हा० - २, क्षे०, ३ अतः कुट्टक से ल० = १, गु० = २, यहाँ पर १ इष्ट मानकर गुण ३ गुणवर्ग (३) अतः १३ - ९ = क्षेप = ४ = कनिष्ठ वर्ग (३)² को प्रकृति १३ से गुणा कर ४ जोड़ने से = १२१ का मूल ११ = ज्ये० । क० ३ ज्ये० ११ क्षे० = ४ भा० = ३ क्षे० ११ और हा० = ४ पूर्ववत् क० = ५ ज्ये० = १८ क्षे० = १ इस प्रकार अनेक अनन्त उत्तर होते हैं । इस प्रकार उक्त कुट्टक, वर्ग प्रकृति और चक्रवाल गणित का यत्र-तत्र सर्वत्र ग्रह गणित में अति आवश्यक उपयोग होता है जिसको संक्षेप से आवश्यक समझ कर यहाँ पर प्रदर्शित किया गया है । इस बीजगणित के उत्तरार्द्ध में भी कुट्टक गणित का उपयोग यथा स्थान आगे भी आ रहा है जो दिखाया जायगा । श्री भास्कराचार्य एवं तत्पूर्ववर्ती आचार्यों ने अव्यक्त पदार्थों की अव्यक्त कल्पना के लिए यावत् = या. तावत् - ता. कालक = का. नीलक = नी. पीतक = पी. लोहितक = लो. श्वेतक = श्वे. हरितक - ह. अभ्रक = अ. इत्यादि संकेत दिये हैं । आधुनिक गणित सागर के गाताखार अव्यक्त मात्र कल्पना के लिए, A, B, C, D, E, F इत्यादि या अ, ब, क, ल, ह, च... इत्यादि वर्णों के मान से अव्यक्त अर्थात् अज्ञात पदार्थों की कल्पना करते हैं ।