भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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२३० गोलाध्याये द्वयभेदनपूर्वकं कार्यमन्यथा खगोलस्य गोलानुकारत्वानुपपत्तिरिति ध्येयम् । तदर्थं तेषा- मुक्तवृत्तानां संपाताभ्यामर्धभागे । अपरमुक्तातिरिक्तं तिर्यग्वृत्तं स्वस्थानाद्दृश्यभूगोलार्ध- संधिस्यवृत्तानुसृताकाशगोलसूक्ष्मवृत्तानुकल्पवृत्तं क्षितिजम् । भूगर्भोदयास्तोपजीव्यं विरच- येद् बध्नीयात् ॥३॥ केदारदत्तः—पूर्वापर वृत्त (जिसे सममण्डल भी कहते हैं) पर लम्ब रूप याम्योत्तर वृत्त की रचना के साथ पूर्वापर याम्योत्तर वृत्त सम्पातद्वय ऊर्ध्वाधर खमध्यगत दो कोण- वृत्तों की रचना करनी चाहिए । इन चारों वृत्तों में प्रत्येक वृत्त के अर्द्ध भाग पर क्षितिज संज्ञक वृत्त की रचना (सम्पात) करनी चाहिए ॥३॥ इदानीमुन्मण्डलमाह— पूर्वापरक्षितिजसंगमयोर्विलग्नं याम्ये ध्रुवे पललवैः क्षितिजादधःस्थे । सौम्ये कुजादुपरि