भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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ग्रहणवासना ३२९ १ नन्वेतदार्योक्तं राधोक्तं सप्रमाणकं कथमवगतमित्यतस्तदुत्तरं भूभासाधनोपपत्तिं संसू- चयन्प्रसङ्गाच्चन्द्रग्रहे व्यस्तदिशस्तु वेद्या इत्यस्योपपत्तिं चोद्गीत्याऽऽह—अनुपातादिति । तस्या भूच्छायाया दीर्घताप्रमाणं छायाव्यवहारोक्तच्छायानयनानुपातात् । शङ्कुः प्रदीप- तलशङ्कुतलान्तरघ्नश्छाया भवेद्धि नरदीपशिखोच्चभक्त इतिनिबद्धाद्द्वयोर्हयो(वन्निर्वाह्या)मिति शेषः । तथा च तद्दैर्ध्यमेव प्रभामानमिति भावः । नन्वेवं भूच्छायाया मण्डलाकारत्वा- भावान्मानैक्यखण्डासम्भवान्नोक्तग्रासानयनानुपपत्तिरत आह—शशिकक्षायामिति । चन्द्रा- धिष्ठिताकाशगोले चकाराद्भूच्छायाविस्तारः । तद्विम्बम् । भूभाबिम्बम् । तद्विस्तार- संबन्धिमण्डलस्य तदन्तर्गतत्वेन तत्त्वान्नानुपपत्तिरिति भावः । एतेनैव चन्द्रग्रहणाधिका- रोक्तभूभासाधनस्योपपत्तिः सूचिता । स्यादेतत् । ग्रहणस्य तुल्यतया शरा यथाशाग्रहणे खरांशोरित्यादिना शरदिग्वैलक्षण्यमुक्तं न युक्तमत आह-भूभेति । यतश्चन्द्रबिम्बाच्छर- वृत्तस्थाद्भूच्छाया चन्द्रकक्षास्था, अन्यदिशि शरदिग्विपरितदिशि भवति । तस्मात्कारणा- च्चन्द्रग्रहणपरिलेखे । क्षेपश्चन्द्रशरो व्यस्तः विपरीतदिक् । शरस्य क्रान्तिवृत्तमूलकत्वात् । सूर्यग्रहणं सूर्योश्चन्द्रस्य शरद्दिशि सद्भात् । यथाद्विक्क एव शरः ॥६॥--- . : केदारदत्त:-पर्वान्त का अर्थ दर्शन्त या अमान्त काल होता है। भूमध्यस्थ दृष्टा पर्वान्त काल में पूर्व या पश्चिम से नत (झुका हुआ) चन्द्रमा से ग्रसित सूर्य को देखता है । यह स्थिति भूमध्यस्थ द्रष्टा के लिये होती है किन्तु भूपृष्ठ रूप द्रष्टा की यह स्थिति केवल अपने खमध्यस्थ सूर्य चन्द्र बिम्ब के होने के समय हो सकती है, अन्यत्र नहीं होती है । अन्यत्र की भूपृष्ठस्थ द्रष्टा व्यक्ति की स्थिति में पृष्ठीय दृष्टि सूत्रगत सूत्र से चन्द्रमा लम्बित दिखाई देता है । सूर्य चन्द्र की भिन्न कक्षाओं का होना ही लम्बन और नति की उत्पत्ति का कारण है । उक्त स्थिति केवल सूर्य ग्रहण में होती है । चन्द्र ग्रहण में छाद्य बिम्ब चन्द्रमा और छादक बिम्ब भू भा (पृथ्वी की छाया) का गमन एक ही कक्षा या एक मार्ग में होने से चन्द्र ग्रहण में नति और लम्बन की उत्पत्ति नहीं होती । क्योंकि चन्द्र ग्रहण में छाद्य छादक की एक कक्षा है । अतः एव आकाश में भूच्छायागत चन्द्रमा को या ग्रहण लगे हुये चन्द्रमा को भूमण्डल के किसी भी दृश्य चन्द्र प्रदेश से जहाँ से चन्द्रमा उनके क्षितिज के ऊपर रहेगा उस विभाग से सभी चन्द्रग्रहण को एक कालावच्छेदेन देखेंगे । सूर्य की गति = भू भा पृथ्वी की छाया की गति और चन्द्रमा की स्वयं अपनी गति होने से चन्द्रमा अपनी गति से भू भा में प्रवेश करेगा अत एवं चन्द्रमा का पूर्व बिम्ब में स्पर्श और भूभा से बहिर्भूत होते समय चन्द्र बिम्ब का पश्चिम बिन्दु भू भा से बाहर होगा । अर्थात् चन्द्रमा का स्पर्श ग्रहग पूर्व बिन्दु एवं मोक्ष ग्रहण पश्चिम बिन्दु से होता है यह स्पष्ट होता है । सूर्य का बिम्ब पृथ्वी बिम्ब से बड़ा होने के नाते सूर्य प्रकाशसे (भू-भा)