सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६२ गोलाध्याये योरल्पल्पान्तरत्वादन्तरं शङ्क्वोरन्तरेण भक्तमित्यनेनापि पलभासिद्धिरुपलभ्यते । दर्शितं चोदाहरणं त्रिप्रश्नाधिकारव्याख्यायां भाद्वयस्येत्यादिपद्योपपत्ताविति । केदारदत्तः—इष्ट कालीन भुजाओं से पलभाज्ञान— एक ही या भिन्न दिशाओं के दो भुजों के अन्तर को १२ से गुणाकर दोनों कालों के शङ्कुओं के अन्तर से भाग देने से लब्धफल पलभा होती है ॥३२½॥ उपपत्ति—४ अंगुल पलभादेश में, उत्तरगोलीय प्रथम शङ्कु ३० अंगुल, जिसका याम्य भुज = ५ अंगुल । दूसरे शङ्कु का मान ३६, दक्षिण भुज=७ अंगुल । अग्रा के बिना शङ्कुकेतल का ज्ञान नहीं होता है । किन्तु भुजाओं का अन्तर = ७ - ५ = २ यही अन्तर शंकु तलों का भी अन्तर होता है। यदि शंकुतल = २ और शंकुओं की ऊँचाइयों का अन्तर = ३६ - ३० = ६ है तो अनुपात से (शंकु तलान्तर × १२) / शंकु अन्तर = (२ × १२) / ६ = पलभा = ४ उपपन्न होती है । यतः सायन मेषादि में उस नगर की पलभा नापने से भी ४ ही अंगुल प्रत्यक्ष देखी गई है । अथवा बीजगणित से उपपत्ति । कल्पनांकिया पलभा = या तो अनुपात से— अनुपात से, (या × शं) / १२ = शं० त०, तथा (या × शं) / १२ = शं'त ∵ शं त ± भु = अग्रा = (या × शं) / १२ × भु, तथा अग्रा' = (या × शं') / १२ × भु' ∵ भु ~ भु' = (या × शं) / १२ ~ (या × शं) / १२ = या / १२ (शं ~ शं') = ((भु ~ भु') × १२) / (शं ~ शं') = या । द्वादशगुणित भुजान्तर को तत्कालीन शङ्कुओं के अन्तर से विभक्त करने से वेधोपलब्ध पलभा के तुल्य पलभा हो जाती है । उपपन्न होता है ॥३२½॥ इदानीं दिग्देशकालानामज्ञाने केवलार्कदर्शनादेव सर्वमाह— यष्ट्या शङ्कुत्रितयं ज्ञात्वा वा कथ्यते सर्वम् ॥३३॥ आद्यन्तशङ्कुशिरसोस्तिर्यक् सूत्रं निबध्य तत्सक्ते । मध्यमशङ्क्वग्राद्द्वे सूत्रे भूमिं पृथङ्नेये ॥३४॥ भूचिह्नद्वितयोपरि सूत्रं तत्रोदयास्तसूत्रं स्यात् । तत्केन्द्रान्तरमग्रा सूत्रादत्रान्तरे ततः प्राची ॥३५॥