भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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यन्त्राध्यायः ४७३ कल्पितम् । तेनाक्षज्यास्थानापन्नपलभायाः कोटित्वम् । द्वादशाङ्गुलशङ्कोर्भुजत्वमिति । लम्बनिपातान्तरभूमानभुजे लम्बोच्छ्रयान्तरं कोटिस्तदा द्वादशाङ्गुलशङ्कुभुजे केत्यनुपातेन पलभा । अन्यथा तदसिद्धेः । न चैतत्क्षेत्र एव भुजकोट्योर्व्यत्यासादुक्तं संगच्छते इति वाच्यम् । ऊर्ध्वाधरकोटेर- पलापेन वक्ष्यमाणानुपपत्तेः । पलभासिद्धितात्पर्येण कोटित्वेन तत्सिद्धावक्षतेश्च । एवं सूर्यवेधाद्यष्टिकर्णे लम्बोच्छ्रायान्तरं कोटिर्लम्बनिपातान्तरं भुजस्तदा त्रिज्याकर्णे क इत्यनु- पातेन शङ्कुदृग्ज्ये भवतः । आभ्यां त्रिप्रश्नोक्तविधिना काल इति धीयन्त्रस्य गोलसंबन्धो- ऽस्त्येवेति भावः ॥४२॥ केदारदत्तः—बुद्धि ही यन्त्र है— विशाल ग्रन्थ रचना और गुरु शिष्य परम्परा से उनके अध्ययनाध्यापन से बुद्धि के साथ शास्त्र सम्बर्धन होता है यह सब तो बुद्धि साध्य है, अत एव ज्योतिष के बृहद् ग्रन्थोक्त अनेकों यन्त्रों के वर्णन से तभी लाभ हो सकता है जब बुद्धि भी साथ दे । अत एव अपने हाथ में स्थापित सुन्दर यष्टि के मूल से अग्रभाग की दृष्टि वशेन आकाश में ग्रह तारा आदिकों के वेध से दृश्यमान आकाश से कोई भी मान अविदित नहीं रहता आकाशस्थ पातालस्थ और जलस्थ सभी वस्तु दृश्य होकर उनकी सभी जानकारियां सुलभ होती हैं, अर्थात् बुद्धि ही ग्रह गति ज्ञान के लिये एक महान् यन्त्र हो जाती है । प्रश्न किसी बांस का मूल और अग्र भाग को देखकर और दृष्टा से वंश की अन्तर भूमि और वांस की ऊँचाई भी देखकर ज्ञात होने पर जो हस्तगत यष्टि से बांस की ऊँचाई, अपने से वांस तक की अन्तर भूमि जान सकता है वही बुद्धियन्त्र का ज्ञाता क्या क्या नहीं जान सकता है । अर्थात् तीव्र बुद्धि का धीयन्त्रवेदी गणक ही सब कुछ वही समझ सकता है । तात्पर्य बुद्धि की प्रधानता से है । यष्टि से ध्रुववेध द्वारा पलभा ज्ञान— यष्टि के अग्रभाग से ध्रुव का वेध कर यष्टि के अग्रभाग से भूमिगत लम्ब मान और यष्टि मूल से भूमिगत लम्बमानों के अन्तर मान को लम्बमान मान कर तथा दोनों लम्ब- मूलों की मध्यगत भूमि को भूमि मान कर ओर यष्टि को कर्ण मान कर जो एक अक्ष- क्षेत्र का सजातीय त्रिभुज बनता है उस आधार से अक्ष क्षेत्रानुपात से ध्रु भू × १२ / ध्रु भू भू = लम्बोच्च्यान्तर कोटि × १२ / अन्तर भूमि = पलभा उपपन्न होती है ॥४०॥४१॥४२॥