सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रश्नाध्यायः ५९३ डितेनाऽऽह—ये वृद्धा लघव इति । अत्रास्मिन्समये ये पृथिव्यां स्थिता वृद्धाः पुरातना गणकाः सगोलगणिततत्त्वाभिज्ञाः । ये लघव आधुनिकाः सांप्रतगणकाः ।। अपिः समु- च्चये ।। तान्प्रति । अञ्जलि हस्ततलयोर्मिलनं बद्ध्वा संपुटीकृत्येत्यर्थः ।। अहं वच्मि वदामि ।। किं तदाह—क्षन्तव्यमिति ।। मया भास्करशर्मणाऽधुना सांप्रतं पूर्वोक्तयो ब्रह्मगुप्तलल्लाद्याचार्याणामुक्तयो दूषिताः ।। अघटमानाः प्रदर्शिता इति यद्धाष्टर्यं कृतं तत्तैर्लघुवृद्धगणकैः क्षन्तव्यम् । सह्यम् । तथा च युष्माभिर्दोषोद्धत्यक्षमापनं गुणज्ञत्वात्कर्त- व्यमिति भावः ।। ननु तत्त्वं वक्तव्यं परोक्तमतत्त्वं किमर्थं दूष्यं येनौद्धत्यं स्फुटं भवति ।। प्रर्दूष्य च क्षमापनविज्ञप्तिरत्यन्तमस्माकं तिरस्कारायेत्यतस्तदुक्तिदूषणे कारणमाह— कर्तव्ये इति ।। यतः कारणात् । स्फुटवासनाप्रकथने । तत्त्वतया पदार्थस्वरूपस्य प्रकर्षेण सूक्ष्मविचारेण प्रतिपादने कत्र्तव्ये सति । पूर्वोक्तिविश्वासिनाम् । पूर्वोक्तिषु विश्वासो यथार्थबुद्धिर्येषामेतादृशां भवताम् । तत्तदूषणम् । तस्य तस्यायथार्थोक्तस्य तत्तदूषणं तेन तेन प्रकारेणाघटमानत्वप्रतिपादनम् । अन्तरेण विना । नितरामत्यन्तम् । प्रतीतिस्तत्त्वत्त्व- ज्ञानं नास्ति न भवति ।। तथाच विना दूषणं भवतां तदुक्तविश्वासान्मदुक्तेनेयंश्र्वार्थतत्त्व- ज्ञानासंभवान्मदुक्तमुपेक्षणीयं भवेद्धिरतस्तद्दूषणकथनेन पूर्वोक्तिविश्वासापगमान्मदुक्तमेवा- पेक्षणीयमिति भावः ।।६०।। केदारदत्त :—विद्वानों से क्षमा प्रार्थना — ग्रहगणित की रचना विशेषता, कुशवृक्ष मूल से शिर तक की उत्तरोत्तर तीक्ष्णता की तरह अत्यन्त सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि की तरह जो विषय भेदन कर अन्तः प्रविष्ट हो जाती है, ऐसी बुद्धि से ग्रहगणित सिद्धान्त ग्रन्थ रचनात्मक ग्रहगणित प्रबन्धों के निर्माण में मेरी बुद्धि से यदि जो कुछ उचित और यदि अनुचित भी कहा जाने से मुझसे यदि कोई धृष्टता भी हुई हो तो तदर्थं विद्वत्समाज से क्षमा याचना करता हूँ ।।५९।। विद्वज्जनों से यदि अपराधी हूँ तो क्षमाप्रार्थी भी हूँ— इस सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ रचना काल में राष्ट्र में उपलब्ध वर्त्तमान उपस्थित बाल या वृद्ध गणितज्ञों, अथवा पूर्वकाल में भूतपूर्वं जो ग्रहगणितज्ञ हुए हैं उन सभी के प्रति मेरी दोनों हाथों के सम्पुटीकरण अर्थात् हाथ जोड़ कर सभी से प्रार्थना है कि, मैंने पूर्वाचार्यों में ब्रह्मगुप्त तथा लल्लाचार्य सविशेष की उपपत्तियों पर जो दोष उद्घाटित किये हैं उस धृष्टता के लिये सभी आचार्यों से क्षमा की प्रार्थना करता हूँ । पूर्वाचार्यों से कथित उपपत्तियों में क्वचित् कतिपय स्थल विशेष पर त्रुटियों का उल्लेख किये बिना उपपत्ति में ठीक प्रतीति (विश्वास) नहीं हो पाती है, अतएव दोष का उद्घाटन आवश्यक हो जाने से यत्र तत्र स्थल विशेष पर पूर्वाचार्यों की मूल और सही पक्ष का उल्लेख आवश्यक हो जाता है, यह सब भी उन्हीं पूर्वाचार्यों की देन है उनसे क्षमा प्रार्थना है । आचार्य की विनम्रता भी स्वतः सिद्ध हो जा रही है ।।६०।। ३८