सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०० गोलाध्याये महेश्वर नामक विद्वान् ब्राह्मण के पुत्र श्रीमद्भास्कराचार्य इस धरणी तल में अवतरित हुये जिन्होंने इस सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ की रचना की है । जिन्होंने पिता के चरणकमल अनुग्रह से समस्त वेद-वेदांग विद्याओं को प्राप्त किया है । सिद्धान्त रीति ज्ञान निष्ठ आधुनिक गणितज्ञों के लिये उपेक्षा से भी एक बार भी ग्रन्थ के अध्ययन करने से बिना प्रयत्न के भी इस ग्रन्थ का हृदय समझ में आ सकता है जिसकी रचना आचार्य भास्कर से हुई है । कुबुद्धियों की कुबुद्धि का मंथन के साथ सुस्पष्ट समीचीन सुन्दर उक्तियों से समग्र ग्रन्थ विभूषित है । जिसके कठिन विषयों का ज्ञान भी सरलता से पाठकों को बुद्धिगत हो जाता है । इस ग्रन्थानुशीलन में अत्यन्त उत्कृष्ट विद्वान् गणकों के लिये यह ग्रन्थ प्रकृष्ट रूप में अनुरागवर्द्धक होगा । अर्थात् इस ग्रन्थ के पठन मनन अनुशीलन से उन गुणों का बुद्धि प्रसार होता रहेगा । तथा ग्रहगणित सिद्धान्तरीतिज्ञान से अपरिचित विद्यार्थी के लिये भी सरलता से ग्रन्थ ज्ञान होता रहेगा । कुछ गणितज्ञ इस ग्रंथ के प्रश्नाध्याय का ही पठन करेंगे, इसलिये भी गोलाध्याय के पूर्व गणिताध्यायादि में प्रश्नों की विवेचना के बावजूद यहाँ पर आवश्यक समझ कर प्रश्नाध्याय का उल्लेख किया गया है । उक्त प्रश्नों का अध्ययनशील गणक की बुद्धिलता अत्यन्त सुबोध सरल उक्तियों के प्रश्नों के उत्तरों के अर्थरूपी पदार्थों के युक्तायुक्त विचाररूपी जल से सिञ्चित मूल से बुद्धिमानों की बुद्धि विवर्धन अर्थात् बुद्धि वृद्धि की वृद्धि होती रहती है । ग्रन्थ के आदि अन्त में आचार्य द्वारा सिद्धि एवं वृद्धि शब्दों का सुन्दर उपयोग हुआ है ।।६१-६४।। इति सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ के ग्रह गोलाध्याय के प्रश्नाध्यायः—१३ की श्री पंडित हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत सोपपत्तिक “केदारदत्तः” हिन्दी व्याख्यान सम्पन्न । संवत २०४४ श्रावण शुक्ल चतुर्थी गुरुवार उत्तरा फाल्गुनी, बव । ३०-७-१९८७ ।