सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 134, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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उपाधिद्वयमन्तरेणोभयोः प्रतिबिम्बत्वायोगात् । तत्राऽपि प्रतिबिम्बो जीवः । बिम्बस्थानीय ईश्वरः । तथा सत्येव लौकिकबिम्बप्रतिबिम्बदृष्टान्तेन स्वातन्त्र्यमीश्वरस्य, तत्पारतन्त्र्यं जीवस्य च युज्यते ।
'प्रतिबिम्बगताः पश्यन्नृजुवक्रादिविक्रियाः ।
पुमान् क्रीडेद्यथा ब्रह्म तथा जीवस्थविक्रियाः ॥'
इति कल्पतरूक्तरीत्या 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' ( उ० मी० अ० २ पा० १ सू० ३३ ) इति सूत्रमपि सङ्गच्छते । अज्ञानप्रतिबिम्बितस्य जीव-
उपाधियोंके बिना दो प्रतिबिम्ब हो ही नहीं सकते । उनमें भी ( बिम्ब और प्रतिबिम्ब दोनोंमें भी ) प्रतिबिम्बस्थानापन्न जीव है और बिम्बस्थानीय ईश्वर है । बिम्बचैतन्यके ईश्वर होनेसे ही लौकिक बिम्ब और प्रतिबिम्बके दृष्टान्तसे ईश्वरमें स्वातन्त्र्य और जीवमें ईश्वरका पारतन्त्र्य संगत होता है ‡ ।
'प्रतिबिम्बगताः०' (जैसे लोकमें कोई पुरुष दर्पणमें पड़े हुए अपने प्रतिबिम्बके ऋजु और वक्र आदि भावोंको बिम्बरूप अपनेसे हुए देखकर खेलता है, वैसे ही ब्रह्म भी जीवस्थ प्राणियोंके कर्मानुसार स्वप्रयुक्त भावोंको देखकर खेलता है ) इस प्रकार कल्पतरुमें कही गई रीतिसे * 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' यह सूत्र भी सङ्गत होता है । जैसे सर्वत्र व्याप्त सूर्यके किरणोंका
- बिम्बभूत चैतन्यके एक होनेसे उपाधिकी भिन्नताके बिना प्रतिबिम्बका भेद नहीं हो सकता । माया और अविद्या दो उपाधियां हैं, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि मूलप्रकृतिके मायात्व और अविद्यात्वके लक्षणभेदसे भिन्न होनेपर भी प्रतिबिम्बद्वयसे अपेक्षित दो उपाधियोंका कहींपर प्रतिपादन नहीं किया गया है और मायाका स्वरूपतः भेद भी सिद्धान्तविरुद्ध है, अतः आभासशब्द लक्षणावृत्तिसे बिम्ब प्रतिबिम्ब उभयपरक ही है ।
‡ 'एष सर्वेश्वरः' इत्यादि श्रुतिसे ईश्वरमें स्वातन्त्र्य सिद्ध है और 'एष ह्येव साधु कर्म कारयति' इत्यादि श्रुतिसे जीवमें पारतन्त्र्य सिद्ध है ।
* 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्'—किसी प्रकारके प्रयोजनके बिना सृष्टि आदिमें प्रवृत्ति रूप ईश्वरकी जो क्रिया है, वह केवल लीला ही है, जैसे लोकमें सब साधनोंसे सम्पन्न पुरुषकी क्रीड़ा किसी प्रयोजनविशेषके लिए नहीं होती, वैसे ही आप्तकाम ईश्वरकी भी प्रयोजनके बिना स्वभावतः ही सृष्टिमें प्रवृत्ति उपपन्न है । लोकमें अत्यन्त सुखका उद्रेक होनेसे हँसना, गाना आदि प्रयोजनके बिना ही होने लगता है और दुःखके उद्रेकसे रोना आदि स्वभावतः हुआ करता है, अतः हँसने या रोनेमें लोकमें कारण पूछा जाता है, परन्तु प्रयोजन नहीं पूछा जाता, यह 'लोकवत्तु' इत्यादि सूत्रका भाव है ।