भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 590 में से

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पृष्ठ 137

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १०७


इति न तदतिरेकेण मुक्त्यन्वयायाऽवच्छिन्नरूपजीवान्तरं वा प्रतिबिम्बजीवा-
तिरिक्तं जीवेश्वरविलक्षणं कूटस्थशब्दितं चैतन्यान्तरं वा कल्पनीयम् ।
'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा' इति श्रवणं जीवस्य तदुपाधिनिवृत्तौ


प्रतिबिम्बरूप जीवका मुक्तिमें अन्वयका संभव नहीं है यह नहीं कह
सकते, इससे प्रतिबिम्बरूप जीवसे पृथक् मुक्तिमें सम्बन्ध होनेके लिए
अवच्छिन्नरूप अन्य जीवकी या प्रतिबिम्ब जीवसे अतिरिक्त जीव और
ईश्वरसे विलक्षण कूटस्थ शब्दसे कहे जानेवाले भिन्न चैतन्यकी कल्पना नहीं
करनी चाहिए । $\dagger$ 'अविनाशी वा अरे०' ( अरे मैत्रेयि ! यह आत्मा अवि-
नाशी है ) इत्यादि श्रुति जीवकी उपाधिका विनाश होनेसे प्रतिबिम्बभावका


नहीं है, जीवचैतन्यमें आवरण नहीं होता है, इसका आगे साक्षिनिरूपणमें वर्णन करेंगे, इससे
स्वप्नमें भी जीवचैतन्यसे ही व्यवहारकी उपपत्ति होगी । 'जिस मैंने स्वप्नमें श्रीकृष्णको देखा था,
वही मैं जागकर उस कृष्णका स्मरण करता हूं' इस प्रकारकी प्रतीतिसे जाग्रत् और स्वप्नके द्रष्टाका
अभेद ही भासता है । इसीलिए प्रातिभासिक जीवकी कल्पना निर्दुष्ट नहीं है ।

$\dagger$ 'अन्धेवानु विनश्यति', 'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा' इत्यादि वाक्योंसे प्रकृत
विज्ञानघन आत्मामें विनाशित्व और अविनाशित्वरूप विरुद्ध धर्मोंका प्रतिपादन किया गया है, परन्तु
इनका एकमें समावेश नहीं हो सकता, इसलिए विनाशी प्रतिबिम्बसे भिन्न विनाशरहित कूटस्थ
चैतन्यकी सिद्धि होती है, यह जो कहा गया है, वह भी असङ्गत है, क्योंकि अविद्या-
प्रतिबिम्ब चैतन्यरूप जीवमें ही प्रतिबिम्बत्वरूप विशेषणांशके नाशके अभिप्रायसे विनाशित्वका
प्रतिपादन है और चैतन्यांश विशेष्य अंशके अभिप्रायसे अविनाशित्वका प्रतिपादन है,
इस प्रकारकी व्यवस्थासे भी विनाशित्व और अविनाशित्वका व्यवहार हो सकता है ऐसी
अवस्थामें गौरवदोषसे दूषित धर्मिभेदकी कल्पना नहीं करनी चाहिए । यहांपर शङ्का
होती है कि अविद्यामें प्रतिबिम्ब चैतन्य जीव है, अविद्यामें बिम्बभूत चैतन्य ईश्वर है और बिम्ब
एवं प्रतिबिम्बमें अनुगत चैतन्य शुद्ध चैतन्य है । इस विवरणपक्षमें चैतन्यके चार भेद
माननेवालोंने कूटस्थका जो अङ्गीकार किया है, उसका किसमें अन्तर्भाव होता है ? जीवमें
या शुद्ध चैतन्यमें तो उसका अन्तर्भाव हो नहीं सकता, क्योंकि ये दोनों किसीके प्रति उपादान
नहीं हैं और कूटस्थ तो स्थूलसूक्ष्म शरीरके प्रति उपादान माना गया है, अतः उनमें कूटस्थका
अन्तर्भाव नहीं हो सकता । ईश्वरमें भी उसका अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि कूटस्थका
देहादि विक्षेपोंमें अवस्थान है और ईश्वरकी ऐसी अवस्थितिमें कोई प्रमाण नहीं है । परन्तु
यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि कूटस्थका जीव या शुद्ध चैतन्यमें अन्तर्भाव न होनेपर भी
ईश्वरमें अन्तर्भाव हो सकता है, क्योंकि वही ईश्वररूप चैतन्य चेतनात्मक और अचेतनात्मक
समस्त प्रपञ्चका उपादान है और देहविकारोंमें उसका अवस्थान भी है, अतः कूटस्थ चैतन्य-
का ईश्वरसे भेद मानना प्रामाणिक नहीं है ।