सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १०९
प्रतिबिम्बोदाहरणमप्ययुक्तम् , गगनाभोगव्यापिनि सवितृकिरणमण्डले सलिले प्रतिबिम्बिते गगनप्रतिबिम्बत्वव्यवहारस्य भ्रममात्रमूलकत्वात् ।
प्रतिबिम्बवादियोंके मतमें जीव और ईश्वरका विभाग दिखलाया गया है, इस ग्रन्थसे प्रतिबिम्बको न माननेवालोंके मतसे जीव और ईश्वरका विभाग दिखलाया जाता है। जो लोग चैतन्यका प्रतिबिम्ब नहीं मानते हैं, उनका मत है कि लोकमें जिनके प्रतिबिम्ब देखे जाते हैं वे सबके-सब रूपवान् होते हैं, जल आदिमें प्रतिबिम्बित चन्द्र आदिमें रूपवत्ताकी उपलब्धि प्रत्यक्ष ही है और जो स्वतः रूपवान् नहीं हैं, जैसे वायु आदि, उनका प्रतिबिम्ब कहींपर भी नहीं होता है। और कदाचित् अरूपवान्का गगनादिके दृष्टान्तसे प्रतिबिम्ब मान भी लिया जाय, तो भी प्रतिबिम्ब जिस स्थलमें होता है उसमें रूप अवश्य ही रहना चाहिए, क्योंकि अरूपी गगनका रूपवान् जल आदिमें ही प्रतिबिम्ब है, अतः उन प्रतिबिम्बवादियोंका पक्ष श्रद्धेय नहीं हो सकता है, यह रहस्य है । ] पूर्व ग्रन्थोंमें नीरूप गगनके जो प्रतिबिम्बका दृष्टान्त दिया गया है, वह भी अत्यन्त युक्तिशून्य है, कारण कि गगनके महाविस्तारमें व्याप्त सूर्य-किरणमण्डलके जलमें प्रतिबिम्बित होनेपर गगनके प्रतिबिम्बकी प्रतीति केवल भ्रममूलक है, अर्थात् जल आदिमें गगनका प्रतिबिम्ब नहीं होता है किन्तु गगनमें व्याप्त सूर्यके किरणोंका ही प्रतिबिम्ब होता है, परन्तु लोग भ्रमसे व्यवहार करते हैं कि गगनका प्रतिबिम्ब है * ।
* इसमें विचारणीय अंश है कि जैसे बाहर 'आकाश नील है' यह व्यवहार होता है, वैसे ही कूप, तडाग इत्यादिमें भी 'नील आकाश और विशाल गगन' ऐसा व्यवहार सभी करते हैं, परन्तु इस व्यवहारको सत्य नहीं मान सकते, इसलिए कूप आदिमें दृश्यमान आकाश प्रतिबिम्बरूप है, ऐसा मानना होगा। इस परिस्थितिमें गगनका, जो नीरूप है, प्रतिबिम्ब नहीं है, ऐसा अपलाप नहीं कर सकते । नीरूपका प्रतिबिम्ब होता ही नहीं, ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि रूप, संख्या और परिमाणका प्रतिबिम्ब देखा जाता है। यदि शङ्का हो कि नीरूप द्रव्यका प्रतिबिम्ब नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वेदान्त-सिद्धान्तमें द्रव्य और गुणकी परिभाषा ही नहीं है, यदि कथञ्चित् मान लिया जाय कि द्रव्य, गुण आदिकी परिभाषा है, तो भी गगनका प्रतिबिम्ब होता है, इसलिए रूपोपहित द्रव्यका प्रतिबिम्ब होता है, ऐसे नियमका स्वीकार करेंगे। उपहितत्व वस्तुगत स्वगतरूपसे होना चाहिए, या आरोपित रूपसे होना चाहिए। अतः आरोपितरूपवाले आकाशका प्रतिबिम्ब हो सकता है, इसमें कोई बाधक नहीं है। यदि शङ्का की जाय कि जलमें आलोकके प्रतिबिम्ब-से ही निर्वाह हो सकता है, फिर गगनके प्रतिबिम्बमें गौरव है, नहीं, क्योंकि आलोकके