सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 141, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १११
निधिप्रभृतिशब्दानां क्षितिसलिलादिशब्दत्वेन प्रतिध्वनेरेवाकाशशब्दत्वेन तस्यान्यशब्दप्रतिबिम्बत्वायोगात् । वर्णरूपप्रतिशब्दोऽपि न पूर्ववर्णप्रतिबिम्बः। वर्णाभिव्यञ्जकध्वनिनिमित्तकप्रतिध्वनेर्मूलध्वनिवदेव वर्णाभिव्यञ्जकत्वेनोपपत्तेः। तस्मात् घटाकाशवदन्तःकरणावच्छिन्नं चैतन्यं जीवः। तदनवच्छिन्नम् ईश्वरः।
न चैवमण्डान्तर्वर्तिनश्चैतन्यस्य तत्तदन्तःकरणोपाधिभिः सर्वात्मना जीव-
करणकी प्रक्रियासे पटह (वाद्यविशेष), समुद्र आदिशब्द पृथ्वी और जल आदिके शब्द हैं, वैसे ही प्रतिध्वनि भी आकाशका ही शब्द है, इसलिए उसे अन्य शब्दका प्रतिबिम्ब मानना युक्तियुक्त नहीं है। वर्णरूपशब्द भी प्रतिध्वनिके समान पूर्व वर्णका प्रतिबिम्ब नहीं है, क्योंकि वर्णकी अभिव्यञ्जक ध्वनिसे उत्पन्न होनेवाली प्रतिध्वनि भी मूलध्वनिके समान वर्णकी अभिव्यञ्जक है, ऐसा माननेसे ही उपपत्ति हो सकती है † । इससे—नीरूप चैतन्यके प्रतिबिम्ब न होनेसे यही स्वीकार करना चाहिए कि घटाकाशके समान अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही जीव है और उपाधिसे अनवच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है ।
संसारान्तर्वर्ती चैतन्यका तत्तत् अन्तःकरणरूप उपाधियोंसे सर्वात्मना जीवभावसे अवच्छेद है अर्थात् संसारान्तर्वर्ती समग्र चैतन्य अन्तःकरणरूप उपाधियोंसे
नहीं है, क्योंकि उसका उत्पादक कोई नहीं है, इस परिस्थितिमें जैसे नीरूप ध्वनि नीरूप आकाशमें प्रतिबिम्बित होती है, वैसे ही नीरूप चैतन्य नीरूप अन्तःकरणमें क्यों प्रतिबिम्बित नहीं होता ? नहीं, यह दृष्टान्त युक्त नहीं है अर्थात् नीरूप आकाशमें नीरूप ध्वनिका प्रतिबिम्ब नहीं है, किन्तु वह शब्दान्तर ही है और उसका उत्पादक आकाश है और निमित्त कारण है—पूर्व शब्द । प्रतिध्वनिके प्रतिबिम्बरूप होनेपर आकाशगुण वह नहीं हो सकती, कारण कि बिम्ब और प्रतिबिम्बके भेदपक्षमें प्रतिध्वनिरूप प्रतिबिम्बके प्रातिभासिक होनेसे उसमें व्यावहारिकगुणत्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती है और बिम्ब प्रतिबिम्बके अभेद पक्षमें प्रतिध्वनिरूप प्रतिबिम्बके बिम्बभूत पृथ्वी आदि शब्दकी अपेक्षासे भेद न होनेके कारण उसमें आकाशगुणत्वकी उपपत्ति भी नहीं हो सकती है, यह भाव है ।
† तात्पर्य यह है कि कण्ठ, तालु आदि वर्णके व्यञ्जक नहीं हैं, परन्तु कण्ठ आदिके अभिघातसे उत्पन्न ध्वनि ही उसकी अभिव्यञ्जक है, इसलिए जैसे मूलध्वनि वर्णकी व्यञ्जक है, वैसे ही प्रतिवर्णकी अभिव्यक्तिमें उत्पन्न प्रतिध्वनि ही वर्णकी व्यञ्जक है, अतः प्रतिवर्ण भी प्रतिबिम्ब रूप नहीं है, इसलिए इस दृष्टान्तसे भी चैतन्यके प्रतिबिम्बका प्रतिपादन नहीं कर सकते हैं ।