भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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११६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


क्रियते भेदरूपो देवः क्षेतेष्वेवमजोऽयमात्मा' 'अत एव चोपमा सूर्यकादिवत्' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० १८) इति श्रुतिसूत्राभ्यां विरोधः । 'अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम्' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० १९)

(जैसे प्रकाशस्वरूप एक सूर्य अनेक जलपात्रोंमें प्रतिबिम्बित होकर अनेकरूप होता है, वैसे ही स्वप्रकाश यह नित्य आत्मा स्वतः एक होनेपर भी उपाधियोंमें प्रतिबिम्बित होकर अनेकरूप होता है * ) इत्यादि श्रुतिके साथ और 'अत एव चोपमा सूर्यकादिवत्' †इस सूत्रके साथ विरोध है ? नहीं, विरोध नहीं है, क्योंकि उदाहृत सूत्रके अनन्तर पठित 'अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम्' ‡


* इत्यादिमें आदिशब्दसे 'एक एव तु भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः, एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्' 'रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' 'जीवेशावाभासेन करोति' इत्यादि प्रतिबिम्बबोधक श्रुतियोंका भी ग्रहण करना चाहिए । प्रथम श्रुतिका अर्थ है—एक ही भूतात्मा जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रके समान सभी उपाधियोंमें प्रतिबिम्बरूपसे अवस्थित होकर अनेकसा दीखता है। द्वितीय श्रुतिका अर्थ है—प्रत्येक उपाधिमें आत्माका प्रतिरूप—प्रतिबिम्ब है। तृतीयाका अर्थ है—माया जीव और ईशको आभाससे—प्रतिबिम्बसे—करती है। अनेक स्थलोंमें प्रतिरूपशब्द प्रतिबिम्बरूप अर्थमें प्रयुक्त हुआ है। 'पुरुषका प्रतिरूप है' अर्थात् पुरुषका प्रतिबिम्ब है। इसलिए श्रुतियोंके साथ विरोध होनेसे अवच्छेदवाद अयुक्त है, यह पूर्वपक्षीका भाव है।

† 'अत एव चोपमा सूर्यकादिवत्' इस सूत्रका अर्थ है-चूँकि आत्मा स्वभावतः एक अद्वितीय है, श्रुतियोंमें उसकी अनेकता औपाधिकरूपसे कही गई है। इसीलिए उसकी औपाधिक अनेकरूपतामें जल आदिमें प्रतिबिम्बित सूर्य आदि दृष्टान्तरूपसे श्रुतियोंमें गृहीत हैं। अर्थात् जैसे सूर्य के एक होनेपर भी जल आदिमें उसके प्रतिबिम्बित होनेसे वह अनेकविध होता है, वैसे ही चैतन्यके स्वतः एक होनेपर भी अन्तःकरण आदिमें उसका प्रतिबिम्ब पड़नेसे वह अनेकविध होता है, यह भाव है।

‡ तात्पर्य यह है कि श्रुतिमें स्थित प्रतिरूपशब्द प्रतिबिम्बवाचक नहीं है, क्योंकि 'वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' इसमें पठित प्रतिरूपशब्दका प्रतिबिम्ब अर्थ नहीं हो सकता । अतः सूर्य आदिके प्रतिबिम्बदृष्टान्तकी स्वरसतासे ही चैतन्यका प्रतिबिम्ब कहना चाहिए, परन्तु यह भी नहीं हो सकता है, कारण कि सूत्रकारने स्वयं ही 'अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम्' इस सूत्रसे उसका निराकरण किया है। सूत्रके दृष्टान्तभागके अर्थका ही मूलमें 'यथा' इत्यादिसे विवरण किया है, तथापि संगृहीत अर्थ यह है—जल आदिके समान अत्यन्त स्वच्छ और रूपवान् उपाधिका ग्रहण न होनेसे सूर्य आदिके समान चैतन्यका प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता, यद्यपि अन्तःकरण उपाधि है, तथापि वह रूपवान् और आत्मासे विप्रकृष्ट नहीं है, जैसे कि सूर्यसे विप्रकृष्ट जल है। इसपर शङ्का होती है कि यदि सूर्यका दृष्टान्त उक्त रीतिसे