भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 148
११८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

र्भावादाध्यासिकं तदनुरोधिवृद्धिह्रासादिभाक्त्वमित्येवं दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोस्सामञ्जस्यादविरोध इति स्वयं सूत्रकृतैवाऽवच्छेदपक्षे तयोस्तात्पर्यकथनात् । ‘घटसंवृतमाकाशं नीयमाने यथा घटे । घटो नीयेत नाकाशं तद्वज्जीवो नभोपमः ॥’ ‘अंशो नानाव्यपदेशात्’ ( उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ४३ ) इति श्रुतिसूत्राभ्यामवच्छेदपक्षस्यैव परिग्रहाच्च । तस्मात् सर्वगतस्य चैतन्यस्याऽन्तःकरणादिनाऽवच्छेदोऽवश्यम्भावीति आवश्यकत्वात् ‘अवच्छिन्नो जीवः’ इति पक्षं रोचयन्ते ॥

अन्तर्भूत होनेसे उसमें अन्तःकरणप्रयुक्त आध्यासिक वृद्धि और ह्रास आदिकी प्रतीति होती है, इस प्रकार दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकका सामञ्जस्य होनेसे विरोध नहीं है—ऐसा स्वयं सूत्रकारने ही ‘यथा ह्ययं’ और ‘अत एव चोपमा’ इत्यादि प्रतिबिम्बबोधक श्रुति और सूत्रका अवच्छेदपक्षमें तात्पर्य कहा है । अवच्छेदपक्षमें श्रुति आदिके विरोधका केवल अभाव ही नहीं है, प्रत्युत श्रुति और सूत्रका आनुकूल्य भी है—‘घटसंवृतम्०’ (जैसे घटके ले जानेपर घटावच्छिन्न आकाश नहीं ले जाया जाता किन्तु केवल घट ही ले जाया जाता है, वैसे ही जीव भी आकाशके तुल्य है अर्थात् जीव भी अवच्छिन्न चैतन्यरूप है और उसकी उपाधिका ही गमन होता है ) इस श्रुतिसे और * ‘अंशो नानाव्यपदेशात्’ इस सूत्रसे भी अवच्छेदपक्षका ही लाभ होता है । इससे अर्थात् प्रतिबिम्बपक्षमें दोष होनेसे और अवच्छेदपक्षमें किसी प्रकारका दोष न होनेसे सर्वगत चैतन्यका अन्तःकरण आदि उपाधियोंसे अवच्छेद अवश्य ही होगा, अतः अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको † जीव मानना ही अत्यन्त आवश्यक है ।


* ‘अंशो नानाव्यपदेशात्’—अंशः—जीव ईश्वरका अंश है, किससे? इससे कि नानाव्यपदेशात्—‘य आत्मानमन्तरो यमयति’ (जो आत्माका—जीवका अभ्यन्तर नियमन करता है ) इत्यादि श्रुतियोंमें नियम्यनियामकरूपसे जीव और ईश्वरका भेद कहा गया है । प्रकृतमें अंशशब्दका अर्थ अवयव या एकदेश नहीं है, परन्तु घटाकाशके समान अन्तःकरणावच्छिन्नत्वरूप है, मुख्य अंशत्व विवक्षित नहीं है, क्योंकि ब्रह्म निरवयव है, अतः उसका मुख्य अंश नहीं हो सकता ।

† यह उपलक्षण है, अर्थात् अविद्यावच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, ऐसा भी जानना चाहिए, क्योंकि ‘कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः’ ऐसी श्रुति पूर्वमें कही जा चुकी है । ‘जीवेशावा-