भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 150
१२०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

राजसूनोः स्मृतिप्राप्तौ व्याधभावो निवर्तते ।
यथैवमात्मनोऽज्ञस्य तत्त्वमस्यादिवाक्यतः ।
इति वार्तिकोक्तेश्च ।
एवं च स्वाविद्यया जीवभावमापन्नस्यैव ब्रह्मण सर्वप्रपञ्चकल्पकत्वात् ईश्वरोऽपि सह सर्वज्ञत्वादिधर्मैः स्वप्नोपलब्धदेवतावज्जीवकल्पित इत्याचक्षते ॥ ६ ॥

एको जीव उताऽनेकस्तत्राऽनुपदवादिनः ।
एकं देहं च तस्यैकमन्यत्स्वप्नसमं विदुः ॥४३॥

एक जीव है या अनेक जीव हैं, इस विप्रतिपत्तिमें अनुपद्वादी (पूर्वोक्त आचार्योंमेंसे कुछ लोग ) कहते हैं कि एक ही जीव है और उसका शरीर भी एक है अन्य सब स्वप्नमें देखे जानेवाले पदार्थोंके समान प्रातिभासिकमात्र हैं ॥४३॥


जैसे व्याधके कुलमें बढ़ा हुआ राजकुमार अपनी राजकुमारताकी स्मृतिसे व्याधभावसे निवृत्त होता है, वैसे ही अज्ञ आत्माकी 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यसे होनेवाली स्मृतिसे अज्ञानता निवृत्त होती है, इस प्रकार वार्तिकका वचन भी है।

बृहदारण्यकभाष्य और वार्तिकके पर्यालोचनसे प्रतिबिम्बादिभावसे रहित पूर्ण ब्रह्ममें ही जीवभावकी सिद्धि है, अतः अपनी अविद्यासे जीवभावापन्न ब्रह्म ही सभी प्रपञ्चकी कल्पना करनेवाला होनेसे सर्वज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त ईश्वर भी—स्वप्नमें उपलब्ध देवताके समान † जीव द्वारा—कल्पित है ॥६॥


अनेक कष्टोंको भोगता है। किसी समयमें गुरुद्वारा या शास्त्रसे जब उसको ज्ञान हो जाता है कि 'मैं जीव नहीं हूँ परन्तु सच्चिदानन्द ब्रह्म ही हूँ' तब जीवभावको भूल कर वह अपने सत्य-स्वरूपका अनुभव करता है ।

† स्वप्न देखनेवाला पुरुष—जीव जैसे स्वयं ही स्वप्नमें अपनेसे भिन्न सर्वज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त किसी देवताकी कल्पना करता है और उसकी अहर्निश पूजा करता है, और उसकी उपासनासे अभ्युदय फल प्राप्त करता है, वैसे ही जागरणमें भी ईश्वर कल्पित है, यह दृष्टान्तका भाव है ।

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