भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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जीवैकत्वानेकत्वविचार ] भाषानुवादसहित १३१


तन्त्वन्तरैः पटान्तरस्येव इतराविद्यादिभिः सकलेतरसाधारणप्रपञ्चान्तरस्योत्पादनमित्येके ।

प्रत्यविद्यं प्रपञ्चस्य भेदं न्यायनये यथा ।
अपेक्षाबुद्धिजद्वित्वं शुक्तिरूप्यं च भिद्यते ॥ ५१ ॥

जैसे न्यायमतमें प्रत्येक पुरुषकी अपेक्षाबुद्धिसे जन्य द्वित्व भिन्न-भिन्न होते हैं, और शुक्तिरूप्यादि प्रातिभासिक पदार्थ भी तत्-तद् अज्ञानसे भिन्न हैं, वैसे ही प्रत्येक अज्ञानके भेदसे प्रपञ्चका भी भेद है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं ॥५१॥

तत्तदज्ञानकृतप्रातिभासिकरजतवत् न्यायमते तत्तदपेक्षाबुद्धिजन्यद्वित्ववच्च तत्तदविद्याकृतो वियदादिप्रपञ्चः प्रतिपुरुषं भिन्नः। शुक्तिरजते त्वया यद् दृष्टं रजतम्, तदेव मयाऽपीतिवदैक्यभ्रममात्रमित्यन्ये ।

तत्‌साधारण विजातीय प्रपञ्चका नाश होता है और जैसे उसी क्षणमें ( तन्तुके नाशक्षणमें ) वर्तमान अन्य तन्तुओंसे पूर्वपटसे विलक्षण पट उत्पन्न होता है, वैसे ही इतर जीवोंकी अविद्या आदिसे—मुक्त जीवसे अन्य समस्त जीवोंका साधारण अन्य प्रपञ्च उत्पन्न होता है ।

जैसे उन उन पुरुषोंके अज्ञानसे ✻ प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति होती है और जैसे न्यायमतमें † उन उन पुरुषोंकी अपेक्षाबुद्धिसे ( अनेकमें एकत्र बुद्धि—यह एक है, यह एक है, इत्यादिरूपसे ) द्वित्व आदि संख्या उत्पन्न होती है, वैसे ही उन उन पुरुषोंके अज्ञानसे आकाश आदि समस्त पदार्थोंकी उत्पत्ति हुई है, अतः अज्ञानके भेदसे प्रत्येक पुरुषके प्रति प्रपञ्च भिन्न-भिन्न है । शुक्तिरजतस्थलमें जैसे एकत्वका भ्रम होता है, जिस रजतको तुमने देखा था वही मैने देखा, वैसे ही जिस प्रपञ्चको तुम देखते हो, उसी प्रपञ्चको 'मैं देख रहा हूँ', इस प्रकार ऐक्यका भ्रम ही है, वस्तुतः प्रपञ्च एक नहीं है, ऐसा भी उन्हीं लोगोंका मत है ।


✻ यहाँ एक शङ्का होती है कि जिस स्थलमें एक कालमें अनेक पुरुषोंको एक साथ ही भ्रम हुआ है, उस स्थलमें उन सभी पुरुषोंके अज्ञान एक रजतके प्रति कारण होंगे, अतः दृष्टान्तकी असम्पत्ति अवश्य होगी, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि उस स्थलमें दैवयोगसे एक पुरुषमें शुक्तिका ज्ञान होनेसे 'नेदं रजतम्' ऐसे बाधक प्रत्यक्षसे सोपादान रजतका नाश होनेपर भी अन्योंमें रजतका भ्रम यथापूर्व अनुवर्तमान रहता ही है। अतः रजतका भेद अवश्य मानना होगा, इसलिए दृष्टान्तकी असिद्धि नहीं है, यह भाव है।

† 'न्यायमते' इस कथनका आशय यह है कि वेदान्तसिद्धान्तमें—द्वित्व आदि अपेक्षा-