भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 163

ब्रह्मके कर्तृत्वस्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित १३३


अथ कीदृशं कर्तृत्वम् । ?
केचिदाहुः—'तदैक्षत सोऽकामयत तदात्मानं स्वयमकुरुत' इति श्रवणान्न्यायमत इव कार्यानुकूलज्ञानचिकीर्षाकृतिमत्त्वरूपमिति ।

कार्यानुकूलविज्ञानमात्रं सा नेतरे तयोः ।
कार्यत्वेनानवस्थानादिति चान्ये प्रचक्षते ॥ ५४ ॥

कोई-कोई कहते हैं कि कार्यानुकूलज्ञानवत्त्व ही कर्तृत्व है, क्योंकि चिकीर्षा (करनेकी इच्छा) और कृतिके कार्य होनेसे तदनुकूल अन्य चिकीर्षा और कृतिके माननेमें अनवस्था प्रसक्त होगी ॥५४॥

अन्ये तु चिकीर्षाकृतिकर्तृत्वनिर्वाहाय चिकीर्षाकृत्यन्तरापेक्षायामनवस्थाप्रसङ्गात् कार्यानुकूलज्ञानवत्त्वमेव ब्रह्मणः कर्तृत्वम् । न च ज्ञानेऽप्येष


ब्रह्ममें कर्तृत्व कैसा है ? [ ब्रह्ममें कोई धर्म नहीं है, अतः यदि कर्तृत्व है, तो उसका स्वरूप क्या है, यह आक्षेपकर्ताका भाव है ]

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे न्यायमतमें कार्यानुकूलज्ञानचिकीर्षाकृतिमत्त्वरूप * कर्तृत्वका लक्षण किया है, वैसे ही प्रकृतमें कर्तृत्वका यही लक्षण है, क्योंकि 'तदैक्षत०' (उसने (ब्रह्मने) देखा, उसने चाहा, और उसने स्वतः ही अपनेको जगद्रूप किया) इत्यादि श्रुति है [ यद्यपि ब्रह्ममें स्वतः कर्तृत्व नहीं है, तथापि औपाधिक कर्तृत्व है, यह भाव है ] ।

कुछ लोग कहते हैं कि चिकीर्षाके प्रति और कृतिके प्रति कर्तृताका निर्वाह करनेके लिए यदि अन्य चिकीर्षा और अन्य कृतिका स्वीकार किया जायगा, तो अनवस्था होगी, इससे कार्यानुकूलज्ञानवत्त्व ही कर्तृत्वका लक्षण है।


* कार्यानुकूलज्ञानचिकीर्षाकृतिमत्त्वम्—कर्तृत्वम् । इसका विवेचन कुछ पङ्क्तियोंके अनन्तर अनुवादमें स्पष्टरूपसे किया गया है, लक्षणमें इच्छा, कृति आदिका यद्यपि समावेश नहीं होता, इच्छानुकूल इच्छा कृतिके अनुकूल कृति ऐसा मानकर उनमें (इच्छा आदिके कर्तृत्वमें) लक्षण-समन्वय किया जायगा, तो परिशेषसे अनवस्था ही प्रसक्त होगी, तथापि इस लक्षणकर्ताओंका अभिप्राय है कि इच्छा आदिसे भिन्न जो कार्य हैं, उनके प्रति कर्तृत्वका यह लक्षण है इच्छा आदिके प्रति नहीं, इच्छा आदिके प्रति अन्यविध कर्तृत्व होगा । इससे इसमें कर्तृत्वलक्षणका अननुगम दोष होता है, यही अस्वरस है, अतः 'कार्यानुकूलज्ञानवत्त्वं कर्तृत्वम्' अर्थात् कार्यका अनुकूल ज्ञान जिसमें रहे, वह कर्ता है, ऐसा 'अन्ये तु' इत्यादिसे अन्य पक्ष कहा जाता है ।

ankurnagpal108@gmail.com