भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 165

ब्रह्मके कर्तृत्वस्वरूपका विचार] भाषानुवादसहित १३५

गर्भद्वारा वीक्षणाधिकयत्नसाध्यत्वात् भौतिकं स्मितमिति कल्पतरूक्तिश्च सङ्गच्छत इति वदन्ति ।

एवं जीवोऽपि कर्ता स्याज्जगतः स्वप्नजस्य च ।
ततः सृष्ट्यनुकूलार्थाऽऽलोचनेनैवेति चापरे ॥ ५५ ॥

यदि कार्यानुकूल ज्ञानवत्त्व कर्तृत्व माना जायगा, तो जीव भी जगत् और स्वप्नका कर्ता होगा, इसलिए सृष्टिके अनुकूल आलोचनात्मक ज्ञानवत्त्व ही कर्तृत्व है, ऐसा कोई लोग कहते हैं ॥५५॥

अपरे तु कार्यानुकूलस्रष्टव्यालोचनरूपज्ञानवत्त्वं कर्तृत्वम्, न कार्यानुकूलज्ञानवत्त्वमात्रम् । शुक्तिरजतस्वाप्नभ्रमादिषु अध्यासानुकूलाधिष्ठानज्ञानवत्त्वेन


पदार्थ वीक्षणसे अधिक यत्नसाध्य हैं, अतः भौतिक पदार्थ स्मित हैं † इस प्रकार कल्पतरुकी उक्ति भी सङ्गत होती है ।

कुछ लोग कहते हैं कि 'मया इदं स्रष्टव्यम्' इत्याकारक कार्यानुकूल जो आलोचनात्मक ज्ञान है, वह जिसमें हो, वह कर्ता है, केवल कार्यानुकूल ज्ञानवान्


† भामतीग्रन्थके आरम्भमें मङ्गलाचरण है—

निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्च भूतानि।
स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः ॥

इसका यह अर्थ है—जैसे पुरुषके निःश्वासमें कोई प्रयत्नविशेषकी आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही जिस ब्रह्मके—ये समग्र ज्ञानके आगार चारों वेद प्रयत्नके बिना ही—कार्य हैं, जिसकी दृष्टिमात्रसे ही ये महाभूत हुए हैं, जिसका हिरण्यगर्भके साथ चराचर विश्व एक मन्दहास्य है और महाप्रलय जिसकी मानो सुषुप्ति है, उस ब्रह्मका नमन करता हूँ । इस श्लोकमें महाभूत ब्रह्मवीक्षित हैं और भौतिक चराचर प्रपञ्च ब्रह्मस्मित हैं, ऐसा कहा गया है, इसी तात्पर्यको कहनेके लिए कल्पतरूकारने यह कहा है कि ‘वीक्षणमात्रेण सृष्टत्वात् भूतानि वीक्षितम्, हिरण्यगर्भद्वारा साध्यं चराचरं वीक्षणाधिकप्रयत्नसाध्यस्मितसाम्यात् स्मितम्’ (केवल वीक्षणसे ही भूतोंकी उत्पत्ति है, अतः भूत वीक्षित कहे गये हैं हिरण्यगर्भ द्वारा चराचरकी उत्पत्ति हुई है, अतः वीक्षणसे अधिक प्रयत्नसाध्यस्मितकी समानता होनेसे चराचर ब्रह्मका स्मित है अर्थात् लोकमें मन्दहासरूप जो स्मित है, उसमें वीक्षणसे—ज्ञानसे अधिक कुछ ओष्ठसंचालनके अनुकूल यत्न करना पड़ता है, वैसे ही चराचरकी उत्पत्तिमें ब्रह्मको वीक्षणके सिवा हिरण्यगर्भकी उत्पत्तिरूप व्यापार करना पड़ता है, अतः वीक्षणाधिक यत्नकी अपेक्षा होनेसे चराचर स्मित हैं, यह भाव है) इस कल्पतरुव्याख्याके आधारपर कार्यानुकूल ज्ञानवत्त्वरूप कर्तृत्वका ही लाभ होता है, क्योंकि ‘वीक्षणमात्रेण सृष्टत्वात्’ इसमें मात्रशब्दसे स्पष्ट ही चिकीर्षा और कृतिका निरास होता है, यह भाव है ।


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