भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 187

आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १५७


अथावरणभङ्गोऽपि तृतीये कीदृशो मतः ।
मोहनाशः स चेदिष्टो मोक्षः स्याद् घटवेदनात् ॥ ७२ ॥

तृतीय पक्षमें आवरणभङ्ग क्या है ? इसके समाधानमें यदि कहा जाय कि अज्ञानका विनाश आवरणभङ्ग है, तो घटज्ञानसे ही, सम्पूर्ण प्रपञ्चनाशका सम्भव होनेसे, मोक्ष हो जायगा ॥ ७२ ॥

अथ तृतीयपक्षे को नामाऽऽवरणाभिभवः ? अज्ञाननाशश्चेत्, घटज्ञानेनैवाऽज्ञानमूलः प्रपञ्चो निवर्तेतेति चेत् ।

खद्योतेनेव तमसिच्छिद्रं केचित् प्रचक्षते ।
कटवद्वेष्टनं भीतभटवद्वा पलायनम् ॥ ७३ ॥

जैसे अन्धकारमें जुगनूके प्रकाशसे छिद्र होता है वैसे ज्ञानसे अज्ञानके एक देशमें छिद्र या चटाईके समान अज्ञानका वेष्टन, या भीत भट (सैनिक) के समान पलायन आवरणभंग है ॥ ७३ ॥

अत्र केचिदाहुः—चैतन्यमात्रावारकस्याऽज्ञानस्य विषयावच्छिन्नप्रदेशे खद्योतादिप्रकाशेन महान्धकारस्येव ज्ञानेनैकदेशेन नाशो वा, कटवत् संवेष्टनं वा, भीतभटवदपसरणं वाऽभिभव इति ।


'आवरणाभिभवके लिए वृत्ति है' इस तृतीय पक्षमें आवरणका अभिभव क्या है अर्थात् आवरणाभिभव किसे कहते हैं ? यदि अज्ञानका नाश आवरणाभिभव है, तो अज्ञानके एक होनेसे घटज्ञानसे सम्पूर्ण अज्ञानका नाश होनेके कारण तन्मूलक 'समस्त प्रपञ्चकी निवृत्ति भी प्रसक्त होगी [ परन्तु प्रपञ्चकी निवृत्ति तो होती नहीं है, अतः अज्ञानका विनाश आवरणाभिभव नहीं हो सकता है ] ।

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे महान्धकारमें जुगनूके प्रकाशसे महान्धकारका एकदेशसे विनाश होता है, सम्पूर्णका विनाश नहीं होता, वैसे ही साक्षीसे अन्य चैतन्यमात्रका आवरण करनेवाले महान् अज्ञानान्धकारके विषयावच्छिन्न प्रदेशमें—एक देशका ही ज्ञानसे विनाश होता है, सम्पूर्णका विनाश नहीं होता, अतः घटज्ञानसे सम्पूर्ण प्रपञ्चका विनाश नहीं होता, क्योंकि उस ज्ञानसे अज्ञानके एकदेशका ही विनाश होता है । अथवा चटाईके समान ज्ञानसे विषयावच्छिन्न अज्ञानका कुछ वेष्टन होता है, वही आवरणाभिभव है, या