भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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१६६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

तत्र धारावहज्ञानेष्वाद्येनैव पराभवात् ।
अज्ञानानां द्वितीयादेः साफल्यं कथमुच्यते ॥ ८१ ॥

शङ्का होती है कि धारावाहिक स्थलमें प्रथम ज्ञानसे ही अज्ञानका विनाश होगा, फिर द्वितीय आदि ज्ञानोंकी सफलता कैसे होगी ? अर्थात् द्वितीयादि वृत्ति निरर्थक होगी यह भाव है ॥ ८१ ॥

नन्वेवं सति धारावाहिकस्थले द्वितीयादिवृत्तीनामावरणानभिभावकत्वे वैफल्यं स्यात्, प्रथमज्ञानेनैव निवर्तनतिरस्काराभ्यामावरणमात्रस्याभिभवादिति ।

अत्राहुर्दीपधारेव तिरस्कृत्य तमः स्थिता ।
वृत्तिधारेत्यनावारो वृत्तीनां क्षेमतः फलम् ॥ ८२ ॥

तमका तिरस्कार करके रहनेवाली दीपधाराके समान वृत्तिकी धारा है, अतः उन वृत्तियोंका आवरणाभिभव—आवरणप्रागभावरक्षण ही फल है, इस प्रकार पूर्वोक्त आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं ॥ ८२ ॥

अत्राहुः—वृत्तितिरस्कृतमप्यज्ञानं तदुपरामे पुनरावृणोति प्रदीपतिरस्कृतं तम इव प्रदीपोपरमे । वृत्त्युपरमसमये वृत्त्यन्तरोदये तु तिरस्कृतमज्ञानं तथैवाऽवतिष्ठते प्रदीपोपरमसमये प्रदीपान्तरोदये तम इव । तथा च

परन्तु एक ज्ञानसे एक अज्ञानका नाश होता है और अन्य अज्ञानोंका तिरस्कार होता है, ऐसा माननेमें धारावाहिक ज्ञानके स्थलमें द्वितीय आदि वृत्तियाँ आवरणकी अभिभावक न होनेसे निरर्थक हो जायँगी, क्योंकि प्रथम ज्ञानसे अज्ञानके निवर्तन और तिरस्कार—इन दोनोंसे आवरणशक्तिका निराकरण होता है ।

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे प्रदीपके विनष्ट होनेपर प्रदीप द्वारा तिरस्कृत अन्धकार ( घट आदिको ) आवृत करता है, वैसे ही वृत्तिद्वारा तिरस्कृत अज्ञान भी घटज्ञानके ( घटवृत्तिके ) विनष्ट होनेपर विषयको आवृत करता है । एक प्रदीपके विनाशकालमें यदि अन्य दीपका उदय हो, तो जैसे अन्धकारका विनाश और तिरस्कार होता है, वैसे ही यदि वृत्तिके उपरामकालमें

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