भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 590 में से

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पृष्ठ 203

[आवरणाभिभव-स्वरूपविचार] भाषानुवादसहित १७३


पयत्वेऽपि प्रमाणवेद्यत्वोक्तेश्च । तस्मात् द्वितीयादिवृत्तीनां प्रामाण्याभावात् उपासनादिवृत्तीनामिवाज्ञानानिवर्तकत्वेऽपि न हानिः । प्रमाणवृत्तीनामेव तन्निवर्तकत्वाभ्युपगमात् ।

है, तथापि वह विवरणमें प्रमाणवेद्य वह (प्रमितिका अविषय) कहा गया है ।

तात्पर्य यह है कि विवरणकारको भी प्रमाका लक्षण अनधिगतत्व-घटित ही अभिप्रेत है, अर्थात् अनधिगताबाधितार्थविषयक ज्ञानत्वरूप प्रमात्व अभिप्रेत है । इसलिए उन्होंने अज्ञानके अनुमितिविषय होनेपर भी उसे प्रमितिका विषय नहीं माना, क्योंकि 'अज्ञोऽहम्' (मैं अज्ञ हूँ) इस अनुभव-रूप साक्षीसे ही अज्ञानकी सिद्धि हुई है, अतः अनुमिति आदिके ज्ञातार्थ-विषयक होनेसे उक्त अज्ञातत्वघटित प्रमात्व अनुमिति आदिमें नहीं है, अतः प्रमात्मकवृत्तित्वेन अज्ञानमें नहीं आया, क्योंकि अज्ञानांशमें पर्वताद्यंशके समान अनुमिति अप्रमाण है । इसी अभिप्रायसे प्रमाणवेद्यत्वका विवरणमें कथन है । साक्षिरूपज्ञानका अज्ञान विषय है, अतः वह प्रमाणवेद्य है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि साक्षिरूप ज्ञान तभी प्रमाणज्ञान हो सकता है, जब कि वह किसी प्रमाणकरणसे उत्पन्न हो, परन्तु वह तो नित्य है, अतः साक्षिज्ञान प्रमा या अप्रमाकी कोटिमें प्रविष्ट नहीं होता । इसी प्रकार अन्य मतावलम्बीयोंने भी ईश्वरज्ञानको प्रमात्व और अप्रमात्वसे रहित ही माना है । अथवा साक्षीसे अतिरिक्त प्रमाणज्ञानसे अवेद्यत्व भी प्रमाणवेद्यत्वका अर्थ हो सकता है, इसलिए अज्ञातत्वघटित ही प्रमाणका लक्षण मानना होगा, ] इससे अर्थात् अज्ञातत्वघटित प्रमालक्षणके न रहनेसे धारावाहिक ज्ञानकी द्वितीयकालिक वृत्तियोंके प्रामाण्य न होनेके कारण उपासनादि वृत्तियोंके समान * उनके अज्ञानके निवर्तक न होनेपर भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि प्रमाणवृत्तियाँ ही अज्ञानकी निवर्तक होती हैं, ऐसा स्वीकार किया गया है ।


* यह भाव है—उपासनाका जो वृत्ति है, वह ज्ञानरूप नहीं है, क्योंकि वह किसी ज्ञानके करणसे उत्पन्न नहीं होती, और मन तो ज्ञानका करण नहीं है, इसका विचार आगे किया जायगा । इसलिए उपासनावृत्ति गमन आदिके समान क्रियारूप है, क्योंकि वह पुरुष-कृतिसाध्य है, अतः वह अपने उपास्यके आवारक अज्ञानका निवारण नहीं करती है । इसी प्रकार इच्छा आदि भी अपने विषयके अज्ञानका निवारण नहीं करते हैं । इसी प्रकार द्वितीयादि वृत्तियाँ अज्ञानका निवारण नहीं करती हैं, क्योंकि वे भी अधिगतार्थविषयक हैं, अतः स्मृतिके समान अप्रमाणरूप हैं ।