भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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१८२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

कथं जीवस्य व्यवहारस्मृत्यादिकमिति शङ्क्यम्, अन्योऽन्याध्यासेन जीवैकत्वापत्त्या कूटस्थस्य जीवान्तरङ्गत्वत् । न च जीवचैतन्यमेव साक्षी भवतु, किं कूटस्थेनेति वाच्यम्, लौकिकवैदिकव्यवहारकर्तुस्तस्योदासीन-द्रष्टृत्वासम्भवेन 'साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च' इति श्रुत्युक्तसाक्षित्वा-योगात् । 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति' इति कर्मफलभोक्तुर्जीवादुदासीनप्रकाशरूपस्य साक्षिणः पृथगाम्नानाच्चेति ।

उक्तो नाटकदीपेऽसौ नृत्यशालास्थदीपवत् ।
नेशो जीवोऽप्यसौ तत्त्वदीपे ब्रह्मेति वर्णनात् ॥९३॥

नृत्यशालामें विद्यमान दीपके समान साक्षी जीव और ईश्वरसे विलक्षण है, ऐसा नाटकदीपमें कहा गया है और तत्त्वदीपमें भी शुद्ध ब्रह्म ही साक्षी कहा गया है ॥ ९३ ॥

नाटकदीपेऽपि नृत्यशालास्थदीपदृष्टान्तेन साक्षी जीवाद्विविच्य दर्शितः। तथा हि—

वृत्ति आदिका अनुभव साक्षीको ही होता है, तो जीवके व्यवहार और स्मरण क्यों होते हैं, क्योंकि अन्यसे अनुभूत वस्तुका अन्यको स्मरण नहीं हो सकता है ? यह शङ्का यद्यपि हो सकती है, तथापि अयुक्त है, क्योंकि अन्योऽन्य तादात्म्यके अध्याससे कूटस्थके साथ ऐक्य होनेके कारण कूटस्थ जीवका अत्यन्त अन्तरङ्ग है। यदि शङ्का की जाय कि जीवचैतन्य ही साक्षी हो, कूटस्थ चैतन्य-रूप अतिरिक्त साक्षीको माननेकी क्या आवश्यकतां है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि लौकिकव्यवहार और वैदिकव्यवहारको अविरतरूपसे करनेवाले जीवा-त्मामें औदासीन्य और द्रष्टृत्वके न रहनेसे 'साक्षी०' (बोद्धा, उदासीन और गुणरहित चैतन्य साक्षी है) इस श्रुति द्वारा प्रतिपादित साक्षित्वकी उपपत्ति ही नहीं हो सकती है और 'तयोरन्यः०' (जीव और कूटस्थ चैतन्‍योंमें से कूटस्थ-भिन्न जीव कर्मफलका भोग करता है और अन्य—कूटस्थ नहीं खाता हुआ बुद्धि आदिके साक्षीरूपसे अपरोक्षतया प्रकाशित होता है।) इस श्रुतिसे कर्म-फलभोक्ता जीवसे पृथक् उदासीन प्रकाशरूप साक्षीका प्रतिपादन भी है।

नाटकदीपमें भी नृत्यशालामें स्थित प्रदीपके दृष्टान्तसे जीवसे अतिरिक्त साक्षी-की सिद्धि की है, जैसे—'नृत्यशालास्थितो दीपः०' (जैसे एकरूपसे स्थित नृत्यशालास्थ दीप स्वामी, सभ्य और नर्तकी आदिको समानरूपसे ही प्रकाशित करता है, प्रभुके (नृत्य करानेवाले अर्थात् नृत्यके अभिमानीके)