सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 222, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें१९२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
[ टिप्पणी ]
साक्षीका भी भेद है। यद्यपि अन्तःकरणसे विशिष्ट चैतन्यमें कर्तृत्व आदि स्वभाव हैं, तथापि उपहित चैतन्यमें स्वतः उदासीन होनेसे साक्षित्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है। अब प्रसङ्गतः विशेषण और उपाधिका निर्वचन करते हैं, जो प्रकृतमें अत्यन्त उपादेय है। विशेषणका लक्षण है—कार्यान्वयित्वे सति व्यावर्तकत्वम् अर्थात् विधेयके साथ अन्वयी हो कर जो लक्ष्यकी अन्य पदार्थोंसे व्यावृत्ति करे। जैसे 'नीलोत्पलमानय' (नील कमल लाओ) इत्यादिमें नील है—विशेषण, विधेय—आनयनमें नीलका उत्पल द्वारा अन्वय भी होता है और रक्त उत्पलसे व्यावृत्ति भी करता है। इसलिए उत्पलका नैल्य विशेषण है। उपलक्षणीभूत पदार्थमें अतिव्याप्तिका निवारण करनेके लिए 'कार्यान्वयित्वे सति' यह विशेषण दिया गया है, जैसे 'यत् काकवत्, तत् देवदत्तगृहम्' (जो कौआवाला है, वह देवदत्तका घर है) इसमें विधेय है देवदत्तगृहत्व, उसका काकके साथ किसी प्रकारसे अन्वय है नहीं, परन्तु अन्य गृहकी व्यावृत्ति तो काक करता है, इसलिए उपलक्षण काकमें दोषनिवारण करनेके लिए सत्यन्त है। यदि केवल यही विशेषणका लक्षण किया जाय कि जो कार्यान्वयी हो वह विशेषण है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि विधेयके साथ विशेष्यका भी अन्वय होता है, अतः विशेष्यमें विशेषणत्वका प्रसङ्ग हटानेके लिए विशेष्यदल—व्यावर्तकत्वदल—अवश्य देना चाहिए। उसके देनेसे विशेष्यमें अतिप्रसङ्ग नहीं है। 'कार्यानन्वयित्वे सति व्यावर्तकत्वे सति कार्यान्वयकाले विद्यमानत्वम् उपाधिलक्षणम्' अर्थात् विधेयके साथ अन्वयी न होकर, विशेष्यका व्यावर्तक होकर कार्यान्वयकालमें विद्यमान हो, वह उपाधि—है। जैसे—लोहितं स्फटिकमानय' (रक्त स्फटिक लाओ) इसमें स्फटिकसन्निहित जपाकुसुम स्फटिकका विशेषण नहीं है, उपाधि है, क्योंकि आनयनरूप विधेयमें जपाकुसुमका किसी प्रकारसे अन्वय नहीं होता है और अन्य स्फटिकसे व्यावृत्ति अवश्य करता है। इसमें 'कार्यानन्वयित्वे सति' यह सत्यन्त विशेषणमें अतिप्रसक्तिके निरासके लिए दिया गया है, और द्वितीय सत्यन्त देनेका प्रयोजन इस प्रकार है, कहींपर यह कहा जाय कि 'काकवद् गृहं प्रविश' (काकवत् गृहमें प्रवेश करो) इसमें प्रवेशरूपकार्यके अन्वयकालमें कदाचित् दैवयोगसे उपलक्षणीभूत काक अन्यत्र चला गया और दूसरा कौआ उस स्थलमें आ गया उस समयमें आये हुए नवीन काकमें कार्यानन्वयित्वे सति अन्वयकालविद्यमानत्वरूप उपाधिका लक्षण होनेसे अतिव्याप्ति हो जायगी, अतः इसके भङ्गके लिए द्वितीय सत्यन्त दिया, इसके देनेसे आगत नवीन काकमें दोष नहीं है, क्योंकि वह व्यावर्तक नहीं है, इसी स्थलमें उपलक्षण काकमें अतिव्याप्तिके वारण करनेके लिए कार्यान्वयकालमें विद्यमानत्वरूप विशेष्य दल दिया। कार्यके अन्वयकालमें दैव योगसे उपलक्षण काककी स्थिति हो सकती है। इससे उपलक्षणमें अतिव्याप्तिके वारणके लिए विद्यमानत्वमें 'नियमेन' यह विशेषण भी देना चाहिये, इसलिए कार्यान्वयकालमें नियमतः जो रहे, यह विशेष्य भागका अर्थ है। कार्यान्वयकालमें नियमतः काक रहता नहीं है, अतः दोष नहीं है, यह भाव है। इसका अधिक विचार अन्यत्र कृष्णालङ्कार व्याख्यामें पृ० १९५ चौ० मु० काशीमें देखना चाहिए।