भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 230
२००सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

प्रकाशमाने तत्र विक्षेपदोषादप्रकाशमानस्य मुक्त्यन्वयिनोऽतिशयस्याऽ-
सम्भवात् । तस्मात् साक्ष्यानन्दस्याऽनावृतत्वकल्पनमयुक्तम् ।

साक्षिण्युपाधिमालिन्यादध्यस्तादपकर्षतः ।
सुखापकर्षमद्वैतविद्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ९९ ॥

अद्वैताचार्य कहते हैं कि संसारावस्थामें साक्षीमें अध्यस्त उपाधिके मालिन्यरूप अपकर्षसे सुखका अपकर्ष अर्थात् तारतम्य है ॥९९॥

अत्राहुरद्वैतविद्याचार्याः—यथाऽत्युत्कृष्टस्यैकस्यैव धवलरूपस्य मालि-

आदिके न रहनेसे पूर्णरूपसे आनन्द प्रकाशित होता है, अतः संसार और मुक्तिदशामें विशेष है, क्योंकि जब निर्विशेष आत्मस्वरूप आनन्द प्रकाशमान है, तो उस दशामें विक्षेपदोषसे अप्रकाशमान और मुक्तिदशामें* प्रकाशमान आनन्दका दृष्टान्तके समान कोई जातिरूप या अवयवरूप विशेष हो ही नहीं सकता है, इससे साक्षीरूप आनन्दको अनावृत मानना अयुक्त है ।

इस आक्षेपके समाधानमें अद्वैत विद्याचार्य† कहते हैं कि जैसे अत्यन्त


* दीपप्रभाके सावयव होनेसे प्रबल वायुके प्रभावसे उसके कुछ अवयवोंके विनाशरूप विक्षेपसे अथवा प्रभागत भास्वरत्वके वायु द्वारा प्रतिबन्धरूप विक्षेपसे दीपप्रभाके प्रकाशमान होनेपर भी उसमें अस्पष्ट प्रकाशता उपपन्न हो सकती है, परन्तु अवयव, गुण आदि विशेषसे रहित ब्रह्मानन्दके—न तो संस्कार या मिथ्याज्ञानसे—अवयवका विनाश या किसी गुणविशेषका प्रतिबन्ध हो सकता है, अतः तत्प्रयुक्त अस्पष्ट प्रकाशता साक्ष्यानन्दमें नहीं आ सकती है, अतः पूर्वोक्त पक्ष असङ्गत है अर्थात् इस रीतिसे भी मुक्ति और संसारमें वैलक्षण्यकी सिद्धि नहीं हो सकती है, यह पूर्वपक्षीका भाव है ।

† जैसे साधारण मलिन दर्पणमें पड़े हुए धवलरूपके प्रतिबिम्बमें साधारण अपकर्ष अध्यस्त होता है, और मध्यम रीतिसे मलिन दर्पणमें प्रतिबिम्बित धवलरूपमें पूर्वकी अपेक्षासे अधिक अपकर्ष अध्यस्त होता है इसी रीतिसे अत्यन्त मलिन दर्पणमें प्रतिबिम्बित धावल्यमें पूर्वकी अपेक्षा अत्यन्त निकृष्ट अपकर्ष अध्यस्त होता है, वैसे ही अन्तःकरणमें जब निरतिशय और अद्वितीय आनन्दका प्रतिबिम्ब होता है, तब साक्षीरूप आनन्द कहा जाता है अर्थात् साक्षी-रूप आनन्दभावको प्राप्त होता है और पूर्व जन्मके किसी विशेष पुण्यकर्मके परिपाकसे स्रक्, चन्दन आदि सुन्दर विषयोंके आकारमें अन्तःकरणकी वृत्ति होती है, तब उस वृत्तिमें प्रति-बिम्बित आनन्द विषयानन्दके नामसे प्रसिद्ध होता है । यहांपर यह विशेषरूपसे जानने लायक वार्ता है—अन्तःकरणका—वृत्ति द्वारा यदि उत्कृष्ट विषय-विशेषोंके साथ—सम्पर्क हुआ है, तो उन उत्कृष्ट विषयोंके साथ अन्तःकरणके सत्त्वगुणका सम्बन्ध होनेसे उत्कर्ष होगा, यदि निकृष्ट विषयोंके साथ सम्बन्ध होगा, तो अकर्ष होगा । इसके अनन्तर अन्तःकरणके सत्त्वांशके

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