सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंअहङ्कार आदिके अनुसन्धानका विचार] भाषानुवादसहित २०७
अत्र केचिदाहुः—स्वसंसृष्टेन साक्षिणा सदा भास्यमानोऽहङ्कारस्तत्तद्-
घटादिविषयवृत्त्याकारपरिणतस्वावच्छिन्नेनापि साक्षिणा भास्यते इति
तस्याऽनित्यत्वात् सम्भवति संस्काराधानं घटादौ विषये इव । नहि
स्वाकारवृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिणैव स्वगोचरसंस्काराधानमिति नियमोऽस्ति ।
तथा सति वृत्तिगोचरसंस्कारासम्भवेन वृत्तेरस्मरणप्रसङ्गात् । अनवस्था-
इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि अहङ्कारके साथ सम्बद्ध साक्षीसे सर्वदा भासमान अहङ्कार तत्-तत् घट आदि विषयक वृत्तिके आकारसे परिणत अहङ्कारावच्छिन्न साक्षीसे भी भासमान होता है, अतः घटादिविषयक वृत्तिसे अवच्छिन्न साक्षी चैतन्यके अनित्य होनेके कारण घटादि विषयमें संस्काराधानके समान अहङ्कारमें भी संस्कारका आधान होता है । [तात्पर्यार्थ यह है कि अहङ्कार आदिकी स्मरणोपपत्तिका लिए अहङ्कार आदि विषयक अन्तःकरणवृत्ति माननेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसके बिना भी संस्कारकी उत्पत्ति द्वारा अहङ्कारादिका अनुसन्धान हो सकता है, कारण कि जैसे अहङ्कार साक्षीसे भासता है, वैसे ही घट, पट आदि विषयाकार वृत्ति प्रतिबिम्बित साक्षीसे भी भासता है, अतः वृत्त्यवच्छिन्न साक्षीरूप चैतन्यके वृत्तिप्रयुक्त अनित्य होनेसे उसकी सूक्ष्मावस्था हो सकती है, इसलिए सूक्ष्मावस्थारूप संस्कार द्वारा अहङ्कार आदिके स्मरण होनेमें कोई बाधक नहीं है, क्योंकि अनित्य होनेसे घटादिविषयक वृत्त्यवच्छिन्न साक्षीरूप चैतन्य जैसे घटादि विषयोंमें संस्कारोंका आधान करता है, वैसे ही उसी वृत्त्यवच्छिन्न साक्षी रूप चैतन्यसे अहङ्कार आदिमें भी संस्काराधान कर सकता है] । कारण कि यह नियम नहीं है—स्वाकारवृत्त्यवच्छिन्न साक्षीसे ही स्वविषयक संस्कारका आधान हो, क्योंकि ऐसा माननेसे वृत्तिगोचर संस्कारके असम्भव होनेसे वृत्तिका स्मरण भी* नहीं होगा,
* तात्पर्य यह है कि दृष्टके अनुसार ही किसी वस्तुकी कल्पना होती है, दृष्ट विरुद्ध नहीं होती, अतः अहङ्कारसे भिन्न घट आदि स्थलोंमें घटाकार वृत्तिसे युक्त चैतन्यसे ही घटका संस्कार उत्पन्न होता है, यह देखा जाता है । इसलिए यही नियम लब्ध होता है कि स्वगोचरवृत्तिसे ही स्वगोचर संस्कारोंका आधान होता है, स्वशब्द प्रकृतमें घटादिपरक है । इस परिस्थितिमें कैसे मान सकते हैं कि अहङ्कारमें अन्य वृत्तिसे संस्कार उत्पन्न होते हैं ? इस शङ्काके समाधानमें कहते हैं कि यद्यपि दृष्टानुसारी ही कल्पना होती है, तथापि इस नियममें कोई प्रमाण नहीं है, जिससे कि वह नियम माना जाय । यदि नियम मानो, तो वृत्तिकी स्मृतिके