भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 240

२१० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


अन्ये त्वविद्यावृत्त्यैव सौषुप्तस्मृतिक्लृप्तया ।
अहङ्कारादिभानेन संस्कारं सम्प्रचक्षते ॥ १०४ ॥

कोई लोग कहते हैं कि सुषुप्तिकालीन अविद्याकी स्मृतिमें क्लृप्त अविद्या-वृत्तिसे ही अहंकार आदिका भान होनेसे उसीसे अहमर्थके संस्कारका आधान होता है ॥ १०४ ॥

अन्ये तु सुषुप्तावप्यविद्याद्यनुसन्धानसिद्धये कल्पितामविद्यावृत्तिमह-माकारामङ्गीकृत्याऽहमर्थे संस्कारमुपपादयन्ति ।
न चाऽस्मिन् पक्षे 'एतावन्तं कालमिदमहं पश्यन्नेवासम्' इति अन्य-ज्ञानधाराकालीनाहमर्थानुसन्धानानुपपत्तिः । अवच्छेदकभेदेन सुखदुःख-


❄ कुछ लोग—उठनेके बाद अविद्या आदिके स्मरणकी उपपत्तिकाके लिए सुषुप्ति अवस्थामें अहमाकार अविद्याकी वृत्तिको मान कर—अहमर्थमें संस्कारका उपपादन करते हैं। इसपर शङ्का होती है कि इस पक्षमें 'एतावन्तं कालम्' 'इतने समयतक मैं इसे देखता ही रहा' इस प्रकार अन्य वस्तुके ज्ञानकी धाराके कालके अहमर्थका अनुसन्धान ( स्मरण ) नहीं होगा ? क्योंकि एक


ज्ञात होता है कि ज्ञान, इच्छा आदिका अवभासक नित्य चैतन्य ही है, इसलिए उसकी सूक्ष्मावस्था न होनेके कारण उन ज्ञान आदिमें संस्कारोंका आधान नहीं हो सकेगा। यदि पूर्वोक्त रीतिसे ज्ञानादिको स्व-स्वावच्छिन्न साक्षिचैतन्यभास्य मानकर इन पक्षोंमें संस्कारोंका आधान माना जाय, तो 'ज्ञातताशब्दसे कहा जानेवाला घटादिगोचर वृत्तिप्रतिबिम्बित ज्ञान घटाकार वृत्तिसे अयुक्त विषयाधिष्ठानरूप ब्रह्मचैतन्यसे भास्य है' इस कथनसे विरोध होगा और ज्ञान, इच्छा आदि अनवच्छिन्न साक्षीसे भास्य हैं, इस द्वितीय पक्षके साथ भी विरोध होगा, अतः इन पक्षोंमें संस्कारोंका आधान कैसे होगा ? इसपर 'तयोरपि' इस ग्रन्थसे उत्तर देते हैं। सारांश यह है कि विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य ज्ञातताका अवभासक है, इस मतमें वह ब्रह्मचैतन्य ज्ञातताका अपरोक्षज्ञानरूप ही माना जाता है, क्योंकि 'यह घट ज्ञात है' इस प्रकार ज्ञातताका अपरोक्ष अवभास होता है। तथा अनवच्छिन्न शुद्ध चैतन्यको भी ज्ञान आदिका अपरोक्ष अवभासरूप मानना चाहिए, क्योंकि उन वृत्तियोंका भी अपरोक्ष भान होता है। इस परिस्थितिमें उक्त दो प्रकारके चैतन्यका स्वविषय ज्ञान, इच्छा आदिके साथ सम्बन्ध अवश्य होगा, क्योंकि जो अपरोक्ष ज्ञान होता है, वह अपने तादात्म्यापन्न विषयोंका अनुभवरूप है, ऐसा नियम है। इसलिए अपने विषयभूत ज्ञान, इच्छा आदिके विनाश समयमें ज्ञानादिसे विशिष्ट उक्त द्विविध चैतन्य भी अवश्य विनष्ट होगा, अतः चैतन्यविनाशरूप संस्कार-का आधान, इन पक्षोंमें भी उपपन्न हो सकता है।
* इस मत में पूर्वमतसे विशेष यह है कि यदि 'स्वाकारवृत्तिसे ही संस्कारोंका आधान

ankurnagpal108@gmail.com

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या) · पृष्ठ 240, कुल 590 में से · BharatKosha