भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 256
२२६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

रजताद्यध्यासेष्वेव तस्य कारणत्वं वाच्यम् ; न तु तदप्रतिबध्येपु पीत-शङ्खाद्यध्यासेषु, असम्भवात् । विशेषदर्शनप्रतिबध्येपु च प्रतिबन्धकज्ञानसामग्र्याः प्रतिबन्धकत्वनियमेन विशेषदर्शनसामग्र्यप्यवश्यं प्रतिबन्धिका वाच्येति तत एव सर्वव्यवस्थोपपत्तेः, किं सादृश्यज्ञानस्य कारणत्वकल्पनया ?

तथाहि—इङ्गालादौ चक्षुःसम्प्रयुक्ते तदीयनैल्यदिरूपविशेषदर्शनसामग्रीसत्त्वान्न रजताध्यासः शुक्त्यादावपि नीलभागादिव्यापिचक्षुःसम्प्रयोगे


इस वादमें भी विशेषदर्शनसे प्रतिबध्य रजत आदि अध्यासोंमें ही सादृश्यज्ञानको कारण मानना चाहिए, विशेषदर्शनसे जो प्रतिबध्य नहीं हैं, ऐसे पीत शङ्ख आदि अध्यासोंमें उसे कारण नहीं मानना चाहिए, क्योंकि वस्तुतः उन स्थलोंमें सादृश्य है ही नहीं। और विशेषदर्शनसे जिनका प्रतिबन्ध होता है, ऐसे शुक्तिरजत आदि अध्यासोंमें प्रतिबन्धक ज्ञानकी सामग्रीके † प्रतिबन्धकत्व-नियमसे विशेषदर्शनसामग्रीको भी अवश्य प्रतिबन्धक मानना चाहिए, इसलिए उसीसे सब व्यवस्थाकी उपपत्ति हो सकती है, तो सादृश्यज्ञानको क्यों कारण मानना ? अर्थात् उसे कारण माननेकी आवश्यकता नहीं है।

चक्षुसे संयुक्त इङ्गाल आदिमें उनके नीलरूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीके होनेसे—रजतका अध्यास नहीं होता है। शुक्तिरजत आदि स्थलमें भी, जिसका कि नील भाग चक्षुसे संयुक्त है, विशेषदर्शन सामग्रीके होनेसे रजतका अध्यास


शुक्तित्व तदाश्रय यह है ) इस विशेषदर्शनसे 'इदं रजतम्' यह भ्रम नहीं होता है, किन्तु उसके अभावमें ही होता है, अतः विशेषदर्शनसे वह रजताध्यास प्रतिबध्य कहलाता है, 'पीतत्वाभावव्याप्यशङ्खत्ववान् अयम्' इस प्रकारके विशेषदर्शनके होनेपर भी 'पीतः शङ्खः' यह अध्यास होता है, अतः विशेष दर्शनसे यह प्रतिबध्य नहीं है, इसलिए धर्मिज्ञान इसमें कारण नहीं होगा, क्योंकि सचमुच पीत पदार्थका सादृश्य शंखमें है ही नहीं, यह भाव है।

† प्रतिबन्धक ज्ञानसे यहां विशेषदर्शनात्मक ज्ञान ही विवक्षित है। जैसे रजतादि अध्यासमें विशेषदर्शन प्रतिबन्धक है, वैसे ही उसकी सामग्री भी प्रतिबन्धक है, दाहकी प्रतिबन्धक मणिकी सामग्री लोकमें दाहके प्रतिबन्धकरूपसे प्रसिद्ध नहीं है, अतः ज्ञान पदका उपादान किया गया है, जो धर्मिज्ञान है, उसमें प्रतिबन्धकज्ञानत्व नहीं है, अतः उसमें भी प्रतिबन्धकत्वकी प्रसक्ति नहीं है, क्योंकि वह अध्यासका अनुगुण ही है। इसीलिए नैयायिकोंने पक्षमें साध्याभाववत्ता ज्ञानको ग्राह्याभावका अवगाहन करनेसे प्रतिबन्धक माना है। उसमें साध्याभावव्याप्यवत्ताज्ञानको प्रतिबन्धक ज्ञानकी सामग्रीके रूपसे अनुमितिका प्रतिबन्धक माना है। इस परिस्थितिमें इसी प्रतिबन्धकी सामग्रीके प्रभावसे अध्यासके कादाचित्कत्व