भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 590 में से

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पृष्ठ 259

सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २२९


तरङ्गादिग्राहकासमवधानेन च शौक्ल्यजलराशित्वादिविशेषदर्शनसामग्र्य-भावाञ्छिलातलत्वाद्यध्यासः । विस्तृते पटे परिणाहरूपविशेषदर्शनसामग्री-सत्त्वान्न पुण्डरीकमुकुलत्वाध्यासः; कर्तनादिविघटिततदाकारे तदभावात्तद-ध्यास इति ।

हो सकता है *, क्योंकि अध्यासके कारणभूत नियत नीलरूप दोषसे, और दूर होनेसे नीरत्वके अभिव्यञ्जक तरङ्ग आदिका ग्रहण करनेवाले साधनोंका समवधान न होनेसे शुक्लरूप, जलराशित्व आदि विशेषोंके दर्शनकी सामग्रीका अभाव है † । और विस्तृत वस्त्रमें इसलिए कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास नहीं होता है कि उस समयमें विस्ताररूप विशेषदर्शनकी सामग्री है, और कतरनेसे कमलाकार हो जानेसे विस्ताररूप विशेषदर्शनकी सामग्रीके न होनेसे उसमें कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास होता है ‡ ।


* तात्पर्य यह है कि जलमें जो नीलशीलातलत्वका अध्यास होता है, उसमें शुक्लरूपात्मक विशेषका परिज्ञान या जलत्वरूप विशेषका परिदर्शन प्रतिबन्धक है, और इन विशेषदर्शनोंकी सामग्री भी प्रतिबन्धक होगी, इसलिए इन विशेषोंके परिज्ञानकी सामग्रीका अभाव होनेसे ही जलमें नीलशीलातलत्वका अध्यास होता है। पहले जलमें नैल्यका अध्यास होनेके बाद सादृश्यज्ञानके द्वारा होनेसे उसमें नीलशीलातलत्वका अध्यास होता है, यह बात नहीं है, दूरस्थ समुद्रजलमें तथा समीपस्थ समुद्रके जलमें नैल्यका नियमतः अध्यास होता है, अतः उसमें नैल्यकाभ्यास नियत से शुक्लरूप, जलत्व आदि विशेषके ग्रहणकी सामग्री अप्रतिबद्ध नहीं है, क्योंकि नैल्यके अभ्याससे शुक्ल रूपकी ग्राहक सामग्री प्रतिबद्ध हो गई है और जलत्वके व्यञ्जक तरङ्ग आदिके ग्रहणका भी दूरत्व दोषसे सन्निधान नहीं है, इसलिए जलत्वका भी ग्रहण नहीं होता है, अतः उक्त प्रतिबन्धक दो ज्ञानोंकी सामग्रीका अभाव होनेसे समुद्रजलमें नीलशीलातलत्वका अध्यास हो सकता है, यह भाव है।

† यहाँपर धर्मिज्ञानमें कारणत्ववादियोंका मत यह है कि समुद्रके जलमें उक्त प्रकारसे विशेषदर्शनसामग्रीका अभाव अपेक्षित है, तथापि उतनेसे ही उसमें वह अध्यास नहीं हो सकता, किन्तु प्रथम जलमें नीलरूपके अध्याससे नीलशिलातलके सादृश्यकी प्रसक्ति होगी और उसके बाद जलमें नीलशिलातलत्वका अध्यास होगा, इसलिए दूरसे समुद्रजलमें उक्त अध्यास करनेवाले समुद्रके पास जाकर कहते हैं कि इस समुद्रके जलमें दूरसे नीलत्व, निश्चलत्व आदिकी समानतासे नीलशिलातलत्वका अध्यास हमें हुआ था, परन्तु अब वह निवृत्त हो गया, इस प्रकारके लोकव्यवहारके देखनेसे सादृश्यज्ञान ही दोषरूपसे अध्यासके प्रति कारण होता है, केवल विशेषदर्शनकी सामग्रीका अभाव नहीं।

‡ अध्यासके प्रति विशेषदर्शनकी सामग्रीके अभावको जो कारण मानते हैं, उनके प्रति ‘स्वतः पद्मपुटे’ (पृ० २२५) इत्यादिसे सादृश्यज्ञानके कारणत्वकी सिद्धिके लिए अन्वय और


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