सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 262, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें२३२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
'न च स्वसम्प्रयोगाभावादेव बाधकान्न तच्चाक्षुषम्, नाऽपि दुष्टेन्द्रिय- सम्प्रयोगजन्यम् इदंवृत्तिसमकालम्, ज्ञानकारणस्येन्द्रियसम्प्रयोगस्याऽर्थका- रणत्वाक्लप्तेः । किन्त्विदंवृत्यनन्तरभावि तज्जन्यं तदभिव्यक्ते साक्षिण्य- ध्यासात् तद्भास्यम् ।' चाक्षुषत्वानुभवस्तु स्वभासकचैतन्याभिव्यञ्जकेदं- वृत्तिजनकत्वेन परम्परया चक्षुरपेक्षामात्रेणेति वाच्यम्, तथा सति पीत-
शङ्का होती है—'इदं रजतम्' इसमें रजतका चाक्षुष प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकता है, क्योंकि उसके साथ इन्द्रियसम्प्रयोग ही नहीं है, यह बाधक है। और इदंवृत्तिके समानकालमें वह रजत दुष्ट इन्द्रियके सम्प्रयोगसे उत्पन्न भी नहीं हो सकता है, क्योंकि जो इन्द्रियसंयोग ज्ञानके प्रति कारणरूपसे क्लृप्त है, वह अर्थके प्रति कहींपर भी कारणरूपसे निश्चित नहीं है। किन्तु वृत्तिके उत्तर कालमें वृत्तिसे ही उत्पन्न होता है और वृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यमें उसका अध्यास होनेसे साक्षीसे ही वह रजत भास्य * है, और रजतमें जो चाक्षुषत्वका अनुभव होता है, वह तो शुक्तिरजतके अवभासक इदमवच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यञ्जक इदंवृत्तिके प्रति [ चक्षुके कारण होनेसे ] परम्परया † चक्षुकी अपेक्षा है, इसलिए होता है, परन्तु यह शङ्का युक्त
* पहले इन्द्रियके सम्प्रयोगसे केवल 'इदम्' अर्थको विषय करनेवाली वृत्ति उदित होती है, और अध्यासकी निमित्तकारण इस इदंवृत्तिसे अविद्या कार्योन्मुखताको प्राप्त कर रजताकारसे परिणत होती है, परिणत रजतका अधिष्ठान होगा—इदमाकारवृत्तिसे अभिव्यक्त इदमवच्छिन्न चैतन्य, इसलिए अहङ्कार आदिके समान वृत्तिके बिना ही अध्यस्त रजत आदिका अवभास होगा, इदमाकार वृत्तिकादाचित्कत्व होनेसे रजताध्यासकी सर्वदा प्रसक्ति नहीं हो सकती है, यदि इस विषयमें शङ्का हो कि शुक्तिरूप्य, जो बाह्यचैतन्यसे ही भास्य है, अहङ्कारके समान साक्षीसे भास्य कैसे होगा ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि साक्षिभास्य शब्दका अर्थ है—विषयकी ज्ञानरूप वृत्तिसे अनुपहित चैतन्यसे जिसका अवभास होता हो, इसलिए अहङ्कार आदिका अवभासक चैतन्य अविद्या विषयके अज्ञानात्मक वृत्तिसे उपहित नहीं होता है, वैसे शुक्तिरजतका अवभासक चैतन्य भी शुक्तिरजत आदि विषयक ज्ञानात्मक वृत्तिसे उपहित नहीं होता है, अतः वह साक्षिभास्य है, इसलिए उक्त शङ्काका अवसर नहीं है, यह भाव है।
† परम्परयाका तात्पर्य यह है कि यद्यपि 'इदं रजतम्' इसमें रजतांशका चक्षुसे ज्ञान होता है, यह अनुभव है, तथापि वह गौण है, प्राधान्यसे नहीं है क्योंकि उस स्थलमें इदमर्थ रूप अधिष्ठानकी वृत्तिकाके लिए चक्षुकी अपेक्षा होती है। रजतगोचर वृत्तिके लिए नहीं, इसलिए किसी अंशमें चक्षुकी अपेक्षा होनेके कारण चाक्षुषत्वकी रजतांशमें परम्परया उपपत्ति होती है।