सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 265, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंकारणे अध्यासका विचारं ] भाषानुवादसहितं २३५
इतरेषामपि तच्चक्षुर्निकटन्यस्तचक्षुषां पीतिमसामीप्यसत्त्वेन तद्ग्रहणस्य दुर्वारत्वात् । एवमप्यतिधवलसिकतामयतलप्रवहदच्छनदीजले नैल्यध्यासे गगननैल्यध्यासे च रक्तवस्त्रेषु निशि चन्द्रिकायां नैल्यध्यासे चाऽनुभूयमानारोपस्य वक्तुमशक्यत्वेन तत्र नैल्यसंसृष्टाधिष्ठानगोचरचाक्षुषवृत्त्यनभ्युपगमे चक्षुरनुपयोगस्य दुष्परिहरत्वाच्च ।
'अनास्वादिततिक्तरसस्य बालस्य मधुरे तिक्तावभासो जन्मान्तरानुभवजन्यसंस्कारहेतुकः' इति प्रतिपादयता पञ्चपादिकाग्रन्थेन
नहीं * होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस पुरुषके पाण्डुरोगी चक्षुकी सन्निधिमें चक्षुओंको ले जानेवाले अन्य पुरुषोंको भी पीतिमाका सामीप्य होनेसे 'पीतः शङ्खः' यह ज्ञान दुर्वार हो जायगा † । ऐसे ही अत्यन्त श्वेत बालुकामय तलमें बहनेवाले स्वच्छ नदी जलमें नीलत्वके अध्यासमें, गगनमें नैल्यके अध्यासमें तथा चाँदनी रातमें रक्त वस्त्रमें नैल्यके अध्यासमें आरोप्यके सर्वथा अनुभूयमान न होनेसे वहाँ नीलतासे संयुक्त अधिष्ठानविषयक नेत्रवृत्तिका स्वीकार न होनेके कारण चक्षुकी अनुपयोगिताका परिहार किया ही नहीं जा सकता ।
'इस जन्ममें जिसने अपनी रसनासे तिक्तताका (तीतेपनका) अनुभव नहीं किया है, ऐसे बालकको मधुर दूधमें तिक्तताका ‡अवभास—साक्षात्कार—जन्मान्तरके अनुभूत तिक्तरसके संस्कारसे होता है, इस प्रकारसे प्रतिपादन करने-
* तात्पर्य यह है कि नेत्रदेशसे विषयके प्रति पित्तद्रव्यके जानेके समय जैसे पित्तसे युक्त पुरुष नयनदेशसे लेकर विषयदेशतक पीतिमाका ग्रहण करता है, वैसे ही अन्य-पुरुष भी नेत्रदेशसे लेकर विषयदेशतक यदि उसका ग्रहण करें, तो उनको 'पीतः शङ्खः' यह प्रतीति हो, परन्तु ग्रहण नहीं करते हैं, अतः उसका ग्रहण नहीं होता है, जैसे आकाशमें उड़नेके समयमें पक्षीका भूम्यदेशसे लेकर ऊपर तक जो पुरुष ग्रहण करता है वही पुरुष आकाशमें दूर जानेपर भी पक्षीका ग्रहण करता है, अन्य ग्रहण नहीं कर सकते हैं, वैसे प्रकृतमें भी है।
† आशय यह है—आकाशमें ऊपरको गये हुए पक्षीको देखता हुआ कोई पुरुष अन्यके प्रति यदि कहे कि जिधर मेरी आँखें गई हैं उधर ही तुम भी अपनी आँखें लगाओ तो तुम्हें भी वह पक्षी दिखाई पड़ेगा, ऐसा करनेपर अन्य पुरुष भी उस पक्षीको देखता है, वैसे प्रकृतमें नहीं है ।
‡ इस ग्रन्थमें तिक्तताका अवभास संस्कारसे सहकृत रसनाजन्य है, ऐसा प्रतीत होता है, क्योंकि उसको केवल संस्कारजन्य माननेसे स्मृतित्वकी प्रसक्ति होगी । इसलिए तिक्तताके अध्यासके