भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २४१

किं चाऽत्र क्लृप्तनियमभङ्गेऽपि न दोषः, 'इदं रजतं पश्यामि, नीलं जलं पश्यामि', इत्यादेरनन्यथासिद्धस्याऽनुभवस्य प्रथमगृहीतानामपि 'प्रत्यक्षमात्रे विषयसन्निकर्षः कारणम्' इत्यादिनियमानां व्यावहारिकविषये सङ्कोचकल्पनमन्तरेणोपपादनासम्भवात् ।

न चैवं सति 'प्रमायां सन्निकर्षः कारणम्, न भ्रमे' इत्यपि सङ्कोचकल्पनासम्भवाद् असन्निकृष्टस्यैव देशान्तरस्थस्य रजतस्य इहाऽऽरोपापत्तिरिति अन्यथाख्यातिवादप्रसारिका; अभिव्यक्तचैतन्यावगुण्ठनशून्यस्य देशान्तर-

किञ्च, शुक्तिरजत आदि स्थलमें नियमका भङ्ग होनेपर भी दोष नहीं है, क्योंकि 'इस रजतको देखता हूँ' 'नील जलको देखता हूँ' इत्यादि अनन्यथासिद्ध अनुभवकी—'प्रत्यक्षमात्रमें विषयका संनिकर्ष कारण है' इत्यादि प्रथमतः गृहीत नियमोंका व्यावहारिक विषयमें संकोच किये बिना—उपपत्ति हो ही नहीं सकती है † ।

यदि शङ्का हो कि 'प्रमामें सन्निकर्ष कारण है, भ्रममें नहीं' इस प्रकारसे भी नियमके संकोचकी कल्पना हो सकनेसे शुक्तिमें असन्निकृष्ट अन्यदेशस्थ रजतके ही आरोपकी आपत्ति होगी, इसलिए अन्यथाख्यातिवाद भी प्रसक्त होता है; नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अभिव्यक्त चैतन्यके तादात्म्यसे शून्य अन्यदेशस्थ रजतकी अपरोक्षता ही नहीं हो सकती ✱। और ख्याति (अपरोक्ष-


जायगा, तो अन्य रजतके संयोगसे अन्य रजतके प्रत्यक्षकी आपत्ति रहेगी ही। इससे अर्थात् प्रथम और तृतीय नियमके असिद्ध होनेसे और द्वितीय नियमके साथ विरोध न होनेसे उक्त नियमोंके साथ असंयुक्त (प्रातिभासिक) पदार्थकी चाक्षुष वृत्ति मानी जाय, तो भी विरोध नहीं है, यह भाव है।

† तात्पर्य यह है कि जैसे स्वप्नप्रपञ्चके केवल साक्षिभास्य होनेपर भी उसमें चाक्षुषत्वक अनुभव होता है, परन्तु उस दशामें चक्षु आदिका उपराम होनेसे उनके साथ उन विषयोंका सम्बन्ध नहीं है, इसी प्रकार शुक्तिरजत आदिमें 'रजत देखता हूँ' इत्यादि अनुभव होनेसे उनका चाक्षुषत्व स्वीकार किया जाता है, इसलिए उक्त नियमोंके सङ्कुचित होनेपर भी कोई आपत्ति नहीं है।

✱ शङ्का और समाधानका तात्पर्य यह है—पूर्वमें इसका प्रतिपादन हुआ है कि 'प्रत्यक्षमात्रमें विषयसन्निकर्ष कारण है' इस सामान्य नियमका अनुभवके अनुसार व्यावहारिक विषयमें संकोच करना चाहिए, इसलिए प्रातीतिक पदार्थोंके अनुभवमें उक्त नियम बाधक नहीं है, इसपर 'न चैवं सति' इत्यादिसे पुनः शङ्का करते हैं कि जब उक्त नियमका संकोच करना अभीष्ट है, तो

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