भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 280
२५०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

गत इव स्पष्टताऽस्ति । तदनन्तरमपि 'कथं तद् ?' इति जिज्ञासाऽनुवृत्तेः ।

न च शब्दान्माधुर्यमात्रावगमेऽपि रसालमाधुर्यादिवृत्त्यवान्तरजाति-विशेषवाचिशब्दाभावात्, तत्सत्त्वेऽपि श्रोत्रात्तस्याऽगृहीतसङ्गतिकत्वात् शब्दादसाधारणजातिविशेषावच्छिन्नमाधुर्यावगमो नास्तीति जिज्ञासाऽनु-वृत्तिर्युक्तेति शङ्क्यम्, 'रसाले सर्वातिशायी माधुर्यविशेषोऽस्ति' इत्य-स्माच्छब्दात्तद्गतावान्तरजातिविशेषस्याऽप्यवगमात् । नह्ययं विशेषशब्द-स्तद्गतविशेषं विहायान्यगतं विशेषं तत्र बोधयति, अप्रामाण्यापत्तेः । न च तद्गतमेव विशेषं विशेषत्वेन सामान्येन रूपेण बोधयति, न

उपदेशके अनन्तर भी वह कैसा है ? या वह किस प्रकारका है ? ऐसी जिज्ञासा बनी रहती है *।

यदि शङ्का हो कि 'आम्र-फलमें मधुर रस आदि हैं' इस प्रकारके सौ बार उपदिष्ट आप्तवाक्यसे केवल मधुर रसके ज्ञात होनेपर भी आमके माधुर्य आदिमें रहनेवाली अवान्तर जातिके बोधक शब्दका अभाव होनेसे और उसके बोधक शब्दके अस्तित्वमें भी श्रोत्रसे ( कानसे ) अवान्तर जाति-विशेषके वाचकशब्दकी शक्तिका ग्रहण न होनेसे उक्तशब्दसे (वाक्यसे) असाधारण जातिविशेषसे युक्त माधुर्यका ज्ञान नहीं होता, इसलिए उक्त स्थलमें जिज्ञासाकी अनुवृत्ति हुआ करती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'रसाले सर्वातिशायी माधुर्यविशेषोऽस्ति' ( आममें सबको मात करनेवाला माधुर्यविशेष है ) इस शब्दसे माधुर्यगत अवान्तरजातिविशेषका भी अवगम होता है, [ परन्तु प्रत्यक्षके समान स्पष्टता नहीं भासती है और जिज्ञासा रहती है ] क्योंकि यह वाक्यविशेष माधुर्यगत विशेषका बोधन न कर अन्यगत विशेषका बोधन करता है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा माननेसे वाक्यमें अप्रामाण्यापत्ति होगी और यह भी शङ्का नहीं कर सकते हैं कि माधुर्यगत जो विशेष है, उसका उक्त शब्द ⁑ सामान्यतः विशेषरूपसे बोध करता है,


* 'आममें बड़ी सुगन्ध और अत्यन्त मीठा रस है, इस विषयके किसी प्रामाणिक पुरुषके हजार बार कहनेपर भी निःसंशय रसादिका ज्ञान नहीं होता है, क्योंकि 'वह मीठा रस कैसा है ?' यह जिज्ञासा उपदेशके बाद भी बनी रहती है, यह भाव है।

† तात्पर्य यह है कि उक्त आप्तशब्दसे आमके माधुर्यका विशेषत्व विशेषरूप सामान्यधर्मसे गृहीत होता है, विशेषवृत्ति विशेषरूपसे गृहीत नहीं होता है, अतः जिज्ञासा होती है, यह शङ्काका