भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 282
३५२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

ब्रह्मणो मननादेः प्रागज्ञानानिवृत्तावस्पष्टता, तदनन्तरं तन्निवृत्तौ स्पष्टतेति वृत्तिनिर्गममुपपादयन्ति ।

न चावरणविच्छेदः स्पष्टता तामनिर्गता ।
करोतु तुल्यविषयतत्तदज्ञाननाशिनी ॥११९॥

यदि शङ्का हो कि आवरणविच्छेदस्वरूप स्पष्टता अनिर्गत वृत्तिसे ही होगी, क्योंकि समानविषयक अज्ञानका समानविषयक वृत्तिज्ञान विनाश करता है ॥११९॥

नन्वेतावताऽपि विषयावरकाज्ञाननिवृत्त्यर्थं वृत्तिनिर्गम इत्युक्तम् । तदयुक्तम् । विषयावच्छिन्नचैतन्यगतस्य तदावरकाज्ञानस्यानिर्गतवृत्त्या निवृत्त्यभ्युपगमेऽप्यनतिप्रसङ्गात् । न च तथा सति देवदत्तीयघटज्ञानेन यज्ञदत्तीयघटाज्ञानस्यापि निवृत्तिप्रसङ्गः, समानविषयकत्वस्य सत्त्वात् ।


अस्पष्टता ही है और मनन आदिके बाद अज्ञानकी † निवृत्ति हो जानेसे ब्रह्ममें स्पष्टता प्रतीत होती है, अतः वृत्तिका बाहर निकलना अत्यन्त अपेक्षित है ।

शङ्का होती है कि इतने ग्रन्थसे अर्थात् 'अत्र केचिदाहुः' इत्यादि ग्रन्थसे भी यही कहा गया है—विषयको आवृत करनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिके लिए वृत्तिकी आवश्यकता है, परन्तु यह अयुक्त है, क्योंकि विषयावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले विषयावरक अज्ञानकी अनिर्गतवृत्तिसे यदि निवृत्ति मानी जाय, तो भी कोई हानि नहीं है । यदि शङ्का हो कि ऐसा होनेपर देवदत्तके घटज्ञानसे यज्ञदत्तके भी घटाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी, क्योंकि उनमें समानविषयकत्व ⁜


† 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यजन्य वृत्ति मनन आदिके अनुष्ठानके पूर्वमें असम्भावना और विपरीतभावनासे सर्वथा प्रतिबद्ध है, अतः वह मनन आदिके पूर्वमें अज्ञानकी निवर्तक नहीं है, और उसके बाद तो असम्भावना और विपरीतभावनाके निवृत्त होनेसे वह वृत्ति अज्ञानकी निवर्तक होगी और ब्रह्ममें स्पष्टत्वका अवगम करावेगी, यह भाव है ।

⁜ विषयको आवृत करनेवाला अज्ञान किसीके मतसे विषयमें रहता है और किसीके मतसे पुरुषमें रहता है, जो लोग पुरुषमें अज्ञान मानते हैं, उनके मतसे वृत्तिके निर्गमके बिना भी—अनिर्गत वृत्तिसे भी, अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, परन्तु जिनके मतसे विषयगत-अज्ञान अर्थात् विषयावच्छिन्नचैतन्यनिष्ठ अज्ञान है, उनके मतमें भी अनिर्गत वृत्तिसे अज्ञान-की निवृत्ति यदि मानी जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, यदि इसपर शङ्का हो कि ज्ञान और अज्ञानके निवर्त्य-निवर्तकरूप विरोधमें समानाश्रयत्व होकर समानविषयकत्व प्रयोजक है। यदि वृत्तिका निर्गमन नहीं माना जायगा, तो केवल ज्ञान और अज्ञानमें समानाश्रयत्वके लब्ध न होनेसे केवल समानविषयकत्व ही प्रयोजक होगा, अतः देवदत्तीय घटज्ञानसे यज्ञदत्तीय