भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 292
३६२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

'वेदान्तप्रमाणकः' इति घण्टाघोषः। सर्वेऽपि वेदान्ता उपक्रमोप-संहारैकरूप्यादितात्पर्यलिङ्गैर्विमृश्यमानाः प्रत्यगभिन्ने ब्रह्मण्यद्वितीये समन्व-यन्ति। यथा चायमर्थः, तथा शास्त्रे एव समन्वयाध्याये प्रपञ्चितः। विस्तरभयान्नेह प्रदर्श्यते इति ॥१९॥

इति सिद्धान्तलेशसङ्ग्रहे प्रथमः परिच्छेदः समाप्तः।


इस शङ्काका परिहार करते हैं कि जीव और ब्रह्मके अभेदमें वेदान्त (उप-निषत्-वाक्य) ही प्रमाण हैं, यह घण्टाघोष है अर्थात् उक्त अभेदमें वेदान्त ही प्रमाण हैं, यह बात जगत्प्रसिद्ध है, क्योंकि सभी वेदान्तोंका उपक्रम, और उपसंहारके ऐक्यरूप* आदि तात्पर्यलिङ्गोंसे विचार करनेपर जीवाभिन्न अद्वितीय ब्रह्ममें ही पर्यवसान होता है। जिस प्रणालीसे वेदान्तोंका तात्पर्य-विषयीभूत जीवाभिन्न अद्वितीय ब्रह्म है, उसका शास्त्रमें—समन्वयाध्यायमें—विचार किया गया है। विस्तारके भयसे प्रकृतमें उसका प्रपञ्च नहीं किया जाता है।

इति श्रीसिद्धान्तलेशसंग्रहके वेदान्ताचार्य-श्रीपण्डितमूलशङ्करव्यासविरचित भाषानुवादमें प्रथम परिच्छेद समाप्त


* उपक्रम आदिका (३३ वें पेजकी) टिप्पणीमें विचार और लक्षण बतलाए गये हैं, अतः वहींसे उपक्रमादिके लक्षणोंका अवधान करना चाहिए।