सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 294, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| २६४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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प्रत्याययितुं शक्यते; 'घटः सन्' इत्यादिघटादिसत्त्वग्राहिप्रत्यक्षादिविरोधात् ।
तत्त्वशुद्धिकृतो विदुः ॥ १ ॥
शुक्तीदन्तेव सन्मात्रं सर्वाध्यक्षेषु गोचरः ।
रूप्यवद्घटभेदादिर्भ्रान्तेरित्याविरुद्धता ॥ २ ॥
उक्त शङ्काके परिहारमें तत्त्वशुद्धिकार कहते हैं कि शुक्तिमें इदन्त्वके समान सभी प्रत्यक्षोंमें सन्मात्रका अवगाहन होता है और शुक्तिमें रूप्यका ज्ञान भ्रान्तिसे ही होता है, वैसे ही सन्मात्रमें घट आदिका भ्रान्तिसे ही अवभास होता है, अतः विरोध नहीं है ॥ १ ॥ २ ॥
**अत्राहुस्तत्त्वशुद्धिकाराः—**न प्रत्यक्षं घटपटादि तत्सत्त्वं वा गृह्णाति, किन्तु अधिष्ठानत्वेन घटाद्यनुगतं सन्मात्रम् । तथा च प्रत्यक्षमपि सद्रूपब्रह्माद्वैतसिद्धयनुकूलमेव । तथा सति 'सद्' 'सद्' इत्येव प्रत्यक्षं स्यात्, न तु 'घटः सन्' इत्यादि प्रत्यक्षमिन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधायीति चेत्, न; यथा भ्रमेष्विदमंशस्याऽधिष्ठानस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणम्, इन्द्रियान्वयव्यतिरेकयोः तत्रैवोपक्षयः । रजतांशस्य त्वारोपितस्य भ्रान्त्या प्रतिभासः,
नहीं सकता है, क्योंकि 'घटः सन्' ( घट सत् है ) इस प्रकारके घट आदिमें सत्त्वके ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्ष आदिके साथ विरोध होगा ।
इस आक्षेपके समाधानमें तत्त्वशुद्धिकार कहते हैं—प्रत्यक्षसे घट, पट आदि विषयोंका अथवा उनमें रहनेवाले सत्त्वका ग्रहण नहीं होता है, किन्तु अधिष्ठानत्वरूपसे घट, पट आदिमें अनुगत सन्मात्रका ही ग्रहण होता है, इसलिए प्रत्यक्षप्रमाण भी सद्रूप, अद्वितीय ब्रह्मकी सिद्धिमें अनुकूल ही है । पुनः शङ्का होती है कि यदि प्रत्यक्ष सन्मात्रविषय ही है, तो 'सत्' 'सत्' इसी प्रकारसे प्रत्यक्ष होना चाहिए, 'घट सत् है, इस प्रकार इन्द्रियके साथ अन्वय और व्यतिरेकका अनुविधायी प्रत्यक्ष नहीं होना चाहिए, तो यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे भ्रमात्मक ज्ञानमें इदमंशरूप अधिष्ठानका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है । इन्द्रियके अन्वय और व्यतिरेक अधिष्ठानप्रत्यक्षमें ही चरितार्थ हैं, और आरोपित रजतांशका प्रतिभास साक्षिरूप भ्रान्तिसे होता है, वैसे ही सर्वत्र इन्द्रियोंसे सन्मात्र अधिष्ठानका ही ग्रहण होता है, इन्द्रियोंका व्यापार उसीके प्रत्यक्षमें समाप्त होता है, और घट, पट आदि वस्तुका प्रतिभास भ्रान्तिसे होता है.