सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| २७० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [द्वितीय परिच्छेद |
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श्रुत्यादिबाधशङ्का । अज्ञातबोधकं हि प्रमाणम् । न च प्रत्यक्षादिविषयस्य घटादेरज्ञातत्वमस्ति, जडे आवरणकृत्याभावेनाऽज्ञानविषयत्वानुपगमात् । स्वप्रकाशतया प्रसक्तप्रकाशं ब्रह्मैवाऽज्ञानविषय इति तद्बोधकमेव तत्त्वावेदकं प्रमाणम्, तदेव प्रमितिविषयः ।
अत एव श्रुतिरपि 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यात्मन एव प्रमेयत्वमिति नियच्छति । नहि 'द्रष्टव्यः' इत्यनेन दर्शनं विधीयते, प्रमाणपरतन्त्रस्य तस्य विध्यगोचरत्वात्, किन्तु 'आत्मा दर्शनार्हः' इति । अज्ञातत्वादात्मन एव प्रमेयत्वमुचितम्, नाऽन्यस्येति नियम्यते इति ।
अद्वैत बोधक श्रुति आदिके बाधकी शङ्का ही नहीं हो सकती है, क्योंकि प्रमाण वही होता है जो अज्ञातका बोध करावे, प्रत्यक्ष आदिके विषय अज्ञात नहीं हैं, जड़पदार्थमें आवरण कार्य न होनेसे अज्ञानविषयत्वरूप अज्ञातत्व नहीं माना गया है । स्वप्रकाश होनेके कारण जिसकी प्रकाशता प्रसक्त है, उसी ब्रह्ममें अज्ञानकी विषयता भी है, इसलिए अज्ञात ब्रह्मवस्तुका बोध करानेवाली 'तत्त्वमसि' आदि श्रुतियां ही तत्त्वावेदक प्रमाण हैं, और वही ब्रह्मप्रमितिका विषय भी हो सकती हैं ।
ब्रह्मके अज्ञात होनेसे ही 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' (अरे मैत्रेयि ! आत्माका साक्षात्कार करना चाहिए) इत्यादि श्रुति भी आत्मामें ही प्रमाविषयत्वका समर्पण करती है । यदि शङ्का हो कि 'द्रष्टव्यः' इससे विधान होता है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ⁕ प्रमाणाधीन आत्मदर्शनमें विधिविषयता हो ही नहीं सकती है । [ यदि शङ्का हो कि विधायक तव्यप्रत्ययकी क्या व्यवस्था होगी ? तो इसका यही उत्तर है कि वह तव्यप्रत्यय अहार्थक है ]—अर्थात् आत्मा साक्षात्कारके योग्य है, इस अर्थका बोधक है । इससे आत्माके अज्ञात होनेसे उसीमें प्रमेयत्व (प्रमाज्ञानकी विषयता) मानना उचित है, 'अन्यत्र नहीं, इस प्रकार नियम होता है †
⁕ विधान उसका होता है, जिसमें कि पुरुष स्वतन्त्र अर्थात् कर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ हो, ज्ञानमें पुरुष स्वतन्त्र नहीं है, क्योंकि प्रमाणोंके रहनेसे ज्ञान तो अपने आप ही हो जाता है, इसलिए प्रमाण पराधीन—प्रमाणमात्रसे ही जिसकी उत्पत्ति हो सकती है, ऐसे—आत्मसाक्षात्कारमें 'द्रष्टव्यः' विधि नहीं हो सकती है, यह भाव है ।
† अर्थात् संसारमें एक आत्मा ही ज्ञातव्य है, अन्य नहीं, क्योंकि वही सम्पूर्ण दुःखोंका