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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 590 में से

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प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित २७५

'तलवद् दृश्यते व्योम खद्योतो हव्यवाडिव ।
न तलं विद्यते व्योम न खद्योतो हुताशनः ॥ १ ॥
तस्मात् प्रत्यक्षदृष्टेऽपि युक्तमर्थं परीक्षितुम् ।
परीक्ष्य ज्ञापयन्धर्मान्न धर्मात् परिहीयते ॥ २ ॥'

इति नारदस्मृतौ साक्षिप्रकरणे प्रत्यक्षदृष्टस्याऽपि प्रत्यक्षमविश्वस्य प्रमाणोपदेशादिभिः परीक्षणीयत्वप्रतिपादनाच्च । नहि नभोनील्यप्रत्यक्षं

'तलवत्०' ( आकाश इन्द्रनीलमणिसे बनी हुई कड़ाईके सदृश दीखता है और जुगनू अग्निके सदृश दिखाई देता है, परन्तु आकाश न तो कटाह है और न जुगनू अग्नि ही है; अतः प्रत्यक्षसे गृहीत अर्थमें भी खूब परीक्षा करनी चाहिए । यदि परीक्षा करके आचार्य अपने शिष्यवर्गको उपदेश करे, तो शिष्यवर्ग ध्येयसे भ्रष्ट नहीं होता । )

इस प्रकार नारदस्मृतिके साक्षीके प्रकरणमें प्रत्यक्षसे गृहीत अर्थकी, प्रत्यक्षप्रमाणका अविश्वास करके प्रमाण ( आगमप्रमाण ), उपदेश आदिसे परीक्षा करनेका प्रतिपादन किया गया है । आकाशकी नीलिमाका जो प्रत्यक्ष


पर आगम प्रत्यक्षसे बलवान् होता है, तात्पर्य यह है कि जिस अर्थमें वेद और वेदसे इतर प्रमाणका परस्पर विरोध प्रसक्त हो, वहींपर एक अर्थमें दोनोंका प्रामाण्य न होनेके कारण उन दोनोंमेंसे किसी एकका बाध होता है, इस अवस्थामें यही प्राप्त होता है कि जो बलवान् है, उससे दुर्बल प्रमाणका बाध करना चाहिए । कौन दुर्बल है ? इस प्रकार जिज्ञासा होनेपर अपेक्षित अर्थका समर्पक होनेसे वचन सार्थक है, इस विषयमें एक शङ्का होती है, वह यह है कि प्रत्यक्षप्रमाण कहींपर अप्रमाण हो, तो प्रपञ्चसत्यत्वके ग्राहक प्रत्यक्षमें भी मिथ्यात्व-रूप विरुद्ध कोटिका अनुसन्धान करनेवालोंको अप्रामाण्यकी शङ्का हो, और इससे शङ्कितदोष-प्रत्यक्ष निर्दुष्ट प्रबल श्रुतिसे बाधित हो, परन्तु वह नहीं होगा, क्योंकि कहींपर भी प्रत्यक्षमें अप्रामाण्यकी अवगति नहीं हुई है, परन्तु रामानुजादिवादियोंकी यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'तलवद्' इत्यादि नारदस्मृतिसे यह अर्थ स्पष्ट प्रतीत होता है, और व्यवहारमें आकाशमें जो नीलादिकी प्रतीति होती है, वह विरुद्ध ही है, अतः प्रत्यक्षप्रमाणमें कहींपर अप्रामाण्य गृहीत नहीं होता, यह कथन असङ्गत है । नारदस्मृतिमें इन श्लोकोंका पाठ साक्षिप्रकरणमें है, उस प्रकरणमें यह शङ्का हुई है कि आत्मामें साक्षित्व नहीं हो सकता है, कारण कि यद्यपि वह ज्ञाता है, परन्तु उदासीन नहीं है, क्योंकि 'मैं करता हूँ' इस प्रकार सब को कर्तृत्वका अनुभव होता है। इसपर इन श्लोकोंसे यही कहा गया कि लोकमें जैसे आकाशादिमें नीलिमा आदिका ग्रहण होता है, परन्तु वह वास्तविक नहीं है, वैसे ही आत्मामें कर्तृत्व आदिका ग्रहण वास्तविक नहीं है, अतः आत्मामें साक्षित्वकी अनुपपत्ति नहीं है, यह भाव है।

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