भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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२८२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद


'एतस्यैव रेवतीषु वारवन्तीयमग्निष्टोम साम कृत्वा पशुकामो ह्येतेन यजेत' इति विशिष्टविधेस्तात्पर्यागोचरेऽपि विशेषणस्वरूपे प्रामाण्यदर्शनेन उक्तनियमासिद्धेः। अत्र हि रेवतीऋगाधारं वारवन्तीयं साम विशेषणम्। न चैतत् सोमादिविशेषणवल्लोकसिद्धम्। येन तद्विशिष्टयागविधिमात्रे प्रामाण्यं वाक्यस्य स्यात्। नाऽपि विशिष्टविधिना विशेषणाक्षेपः। आक्षेपाद्विशेषणप्रतिपत्तौ विशिष्टगोचरो विधिः। तस्मिंश्च सति तेन विशेषणाक्षेपः इति परस्पराश्रयापत्तेः। अतो विशिष्टविधिपरस्यैव वाक्यस्य विशेषणस्वरूपेऽपि

'एतस्यैव०' ❋ इत्यादि विशिष्टविधिके—तात्पर्यका विषय न होनेपर भी विशेषण-स्वरूपमें—प्रामाण्यके देखनेसे पूर्वोक्त नियम नहीं हो सकता है। प्रकृतमें रेवती नामकी ऋचाओंमें वारवन्तीयनामक साम विशेषण है, परन्तु यह † वारवन्तीय साम सोम आदि विशेषणके समान लोकसिद्ध नहीं है, जिससे कि उक्त साम-विशिष्ट यागकी विधिमात्रमें वाक्यका प्रामाण्य हो। और विशिष्टविधिसे विशेषणका आक्षेप भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि आक्षेपसे विशेषणके ज्ञात होनेपर विशिष्टविधि होगी और विशिष्टविषयकविधिके ज्ञात होनेपर उससे विशेषणका आक्षेप होगा, इस प्रकार ‡ अन्योन्याश्रय प्रसक्त होगा। इससे विशिष्टविधिके


❋ 'एतस्यैव०' (रेवत्यधिकरणवाले वारवन्तीयनामक सामसाध्य अग्निष्टोमस्तोत्रविशिष्ट प्रकृत अग्निष्टुद् धर्मवाले यागसे पशुकी अभिलाषा करनेवाला इष्ट सम्पादन करे) रेवती ऋचा—जिसमें 'रे' शब्द आता है, ऐसी 'रेवतीनः' इत्यादि ऋचा। वारवन्तीयम्—'अश्वं न त्वा वारवन्तम्' इस ऋचामें गेय साम। अग्निष्टोम साम—'यज्ञा यज्ञा वो अग्नय' इसमें गेय साम। प्रकृतमें इस रेवत्याधारऋचारवन्तीयसामादिविशेषणविशिष्ट क्रतुभावनाविधिका तात्पर्यविषय विशेषणस्वरूप नहीं है, परन्तु विशेषणस्वरूपमें प्रामाण्य होनेसे उक्त नियम अर्थात् शब्दतात्पर्यविषयत्व शाब्दप्रमितिविषयताके प्रति व्यापक है, यह नियम सिद्ध नहीं हो सकता है, इसी ग्रन्थका 'अत्र हि' इत्यादि ग्रन्थसे विवरण किया गया है।

† रेवती ऋचाधारक वारवन्तीयनामक साम विशेषण है, और यह किसी लौकिक प्रमाणसे प्राप्त नहीं है, यदि वह किसी लौकिक प्रमाणसे प्राप्त होता, तो वारवन्तीय सामरूप विशेषणकी दधि आदिके समान लोकतः प्राप्ति होनेसे 'एतस्यैव' इत्यादि वाक्यका उससे अतिरिक्त अर्थमें प्रमितिजनकत्वरूप प्रामाण्य होता, परन्तु ऐसा नहीं है, क्योंकि वारवन्तीय साम अन्य ऋचाओंमें अध्ययनसिद्ध है, अतः उक्त वाक्यसे ही रेवतीऋचाधारकवारवन्तीयसामरूप विशेषणकी प्रमिति कहनी चाहिए, यह भाव है।

‡ तात्पर्य यह है कि विशेषणगुणविषयक विधिकी कल्पनाके पूर्वमें विशिष्टविधिसे विशेषणका स्वरूप प्रमित है या नहीं? प्रथम पक्ष मानें, तो विशेषगोचरविधिकी कल्पना व्यर्थ है द्वितीय