सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २८८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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चित् स्वोचितविषयोपहारेण सम्भावनीयम् , निर्विषयज्ञानायोगात् । अत एवाऽद्वैतश्रुतिविरोधेन तत्त्वावेदनात् प्रच्यावितं सत्यत्वम् अर्थक्रियासमर्थव्यावहारिकविषयसमर्पणेनोपपाद्यते । किं बहुना 'नेदं रजतम्' इति सर्वसिद्धप्रत्यक्षबाधितमपि शुक्तिरजतप्रत्यक्षमनुभवानुरोधात् पुरोदेशे शुक्तिसंभिन्नरजतोपगमेन समर्थ्यते, न तु तद्विरोधेन व्यवहितमान्तरमसदेव वा रजतं
उपहारसे ( समर्पणसे ) उपपत्ति करनी चाहिए, क्योंकि जितने ज्ञान होते हैं, वे सब सविषयक होते हैं अर्थात् प्रत्यक्षजन्य ज्ञानका कोई विषय नहीं होता, तो उसके ज्ञानत्वकी व्याहृति होगी, इससे ज्ञानकी उपपत्ति के लिए उस ज्ञानमें योग्य विषयकी कल्पना करनी चाहिए, यह भाव है ] । इसीलिए अर्थात् प्रत्यक्ष आदि ज्ञान अविषयक नहीं हो सकते हैं, इससे [ भाष्य आदि निबन्धोंमें ] अद्वैतब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंके साथ विरोध होनेसे [ द्वैतप्रपञ्चमें तात्त्विकत्व न होनेके कारण द्वैतबोधक प्रत्यक्षमें ] तत्त्वावेदकरूप प्रामाण्यसे रहित सत्यत्वकी अर्थक्रियामें समर्थ व्यावहारिक विषयके समर्पणसे उपपत्ति करते हैं ।
अधिक क्या कहा जाय, * 'नेदं रजतम्' ( यह रजत नहीं है ) इस प्रकार बाधक प्रत्यक्षसे, जो सभीको सम्मत है, शुक्तिमें रजतका यद्यपि प्रत्यक्ष बाधित है, तथापि अनुभवके अनुसार पुरोवर्ती प्रदेशमें शुक्तिके साथ तादात्म्यापन्न रजतकी उत्पत्ति मानकर उस प्रत्यक्षकी उपपत्ति की जाती है, परन्तु रजतमें इदमर्थके साथ अभिन्नत्वानुभवके विरोधसे अन्यदेशस्थ या ज्ञानाकार रजत विषय नहीं माना जाता है, [ तात्पर्य यह है कि देशान्तरस्थ रजतको 'इदं रजतम्' ( यह रजत है ) इत्याकारक भ्रमज्ञानमें विषय मानेंगे अथवा ज्ञानाकार रजतको विषय मानेंगे, तो 'इदं रजतम्' इस प्रकार पुरोवर्ती प्रत्यय नहीं होगा अर्थात् इदमर्थके साथ अभेदको वह प्रत्यक्ष अवगाहन नहीं करेगा, क्योंकि देशान्तरमें रहनेवाला
* अद्वैतश्रुतिबाधित घट आदिका प्रत्यक्ष निर्विषयक माना जाय, तो जैसा सम्पूर्ण व्यवहारका लोपप्रसङ्ग बाधक है, वैसा शुक्तिरजत आदि प्रत्यक्ष निर्विषयक माने जानेपर बाधक नहीं है, क्योंकि कहींपर असत् रजत आदिका भी भान माना गया है, तथापि सिद्धान्तमें शुक्तिरजतस्थलमें तात्कालिक रजतकी उत्पत्ति मान कर उसी रजतको शुक्तिरजत प्रत्यक्षका विषय मानते हैं, क्योंकि निर्विषयक प्रत्यक्ष नहीं होता है, इससे श्रुतिबाधित प्रत्यक्ष जहाँ निरवकाश होता है, वहाँ उस प्रत्यक्षसे श्रुतिका बाध युक्त और सिद्धान्तसम्मत है, अतः श्रुतिका प्राबल्य औत्सर्गिक है !