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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 321

प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २९१

'कृष्णलं श्रपयेद्' इत्यादावपि प्रत्यक्षस्याऽत्यन्तनिर्विषयत्वप्रसक्तौ तत्परि- हाराय श्रुतौ लक्षणा उष्णीकरणे। 'नेह नानाऽस्ति किञ्चन' इत्यत्र प्रत्यक्षस्य कथञ्चिद्विषयोपपादनसम्भवे तु न प्रबलायाः श्रुतेरन्यथानयन- मिति न कश्चिदप्यव्यवस्थाप्रसङ्गः।

अथवा कृष्णलेऽशक्तेर्लक्षणा श्रपयोर्दिह । व्यवस्थेत्थं विवरणवार्तिके समुदीरिता ॥ ११ ॥

अथवा कृष्णलके पाकमें किसीकी सामर्थ्य न होनेसे 'श्रपयेत्' की उष्णीकरणमें लक्षणा मानी जाती है, इस प्रकार विवरणवार्तिकमें व्यवस्था कही गई है।

व्यवस्थाका आश्रयण करके भाग-त्याग लक्षणाका * आश्रयण किया जाता है। इसी प्रकार 'कृष्णलं श्रपयेत्' इत्यादि † स्थलोंमें भी प्रत्यक्षकी निर्विषयता प्रसक्त होनेसे उसका परिहार करनेके लिए श्रुतिमें 'श्रपयेत्'की केवल गर्म करनेमें लक्षणा की जाती है। 'नेह नानाऽस्ति किञ्चन' (ब्रह्ममें कोई द्वैत है ही नहीं) इत्यादिमें यदि किसी प्रकारसे भी प्रत्यक्षके सविषयकत्वका उपपादन कर सकते हैं, तो प्रबलश्रुतिकी लक्षणा नहीं माननी चाहिए, इस प्रकारसे कोई अव्यवस्था प्रसक्त नहीं है।


* 'तत्त्वमसि' इस महावाक्यमें 'त्वम्' शब्दका अर्थ है—'अन्तःकरणविशिष्ट चेतन' इसमें दो भाग हैं—एक विशेषण और दूसरा विशेष्य, उनमेंसे विशेषणभागका—अन्तःकरणां-शका—त्याग करके चैतन्यमात्र विशेष्य दलका परिग्रहण करना चाहिए। वैसे ही 'तत्' शब्दके—मायाविशिष्ट चैतन्यरूप अर्थमें भी दो भाग करके विशेष्यमात्रमें ही लक्षणा करनी चाहिए, यह भाव है।

† 'कृष्णलं श्रपेत्' इस श्रुतिके जोरसे कृष्णलोंमें रूपरसादिकी परावृत्तिके प्रादुर्भाव पर्यन्त पाक माना जाय, तो उनमें श्रपणाभावका जो प्रत्यक्ष होता है, उसका कोई विषय ही नहीं होगा। और कृष्णलोंमें अनुभूयमान जो श्रपणका अभाव है, वह पारमार्थिक नहीं है, क्योंकि अद्वैत श्रुतिके साथ विरोध होगा, अतः व्यावहारिक ही मानना होगा, इससे श्रुतिद्वारा उक्त श्रपण भी व्यावहारिक मानना होगा, इस परिस्थितिमें कृष्णलोंमें व्यावहारिक श्रपणका अभाव कैसे रहेगा और उसे प्रातिभासिक भी नहीं मान सकते हैं, क्योंकि उसका व्यवहारकालमें बाध नहीं होता है, अतः श्रपणाभावका प्रत्यक्ष अवश्य निर्विषयक होगा, अतः श्रपणकी उष्णीकरणमें (अर्थात् कृष्णलोंको केवल अग्निसे गर्म करनेमें) ही लक्षणा करनी चाहिए। इसी प्रकार 'सोमेन यजेत' इत्यादि स्थलमें भी सोम और यागका अभेद प्रत्यक्षसे बाधित है, अतः मत्वर्थमें लक्षणा करनी चाहिए, यह भाव है।

‡ द्वैतमें मिथ्यात्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंके और द्वैतमें सत्यत्वग्राही प्रत्यक्षके

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