सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 326, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें२९६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
'नैमित्तिकशास्त्रस्य ह्ययमर्थः—निमित्तोपजननात् प्रागन्यथाकर्तव्योऽपि क्रतुर्निमित्ते सत्यन्यथाकर्तव्यः' इति शास्त्रदीपिकावचनमिति, तन्न; अङ्गस्य सतः कर्तव्यत्वम् । न च पश्चाद्भाविप्रतिहर्त्रपच्छेदवति क्रतौ पूर्ववृत्तोद्गात्रापच्छेदनिमित्तकस्य प्रायश्चित्तस्याऽङ्गत्वमस्ति। आहवनीयशास्त्रस्य पदहोमातिरिक्तहोमविषयत्ववद् 'यद्युद्गाताऽपच्छिद्येत' इति शास्त्रस्य पश्चाद्भाविप्रतिहर्त्रपच्छेदरहितक्रतुविषयत्वात् ।
उक्तं हि न्यायरत्नमालायाम्—
'साधारणस्य शास्त्रस्य विशेषविषयादिना ।
संकोचः कॢप्तरूपस्य प्राप्तबाधोऽभिधीयते ॥'
प्रवृत्त हुए शास्त्रको नैमित्तिक शास्त्र कहा जाता है ) यह अर्थ है—निमित्तके उत्पन्न होनेके पूर्वमें अन्यरूपसे अर्थात् उत्तरकालमें उत्पन्न होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदके पूर्वमें अदक्षिणारूपसे किया जानेवाला भी यज्ञ निमित्तके आ जानेपर अन्य रीतिसे अर्थात् अनन्तर प्रतिहर्ताके विच्छेद होनेपर सर्वस्वदक्षिणारूपसे किया जाता है' इस प्रकारका शास्त्रदीपिकाकारका वचन भी उपपन्न होता है । परन्तु यह सब कल्पना असङ्गत है, क्योंकि [ विरुद्ध प्रकारसे जहाँ अपच्छेद हुए हैं, वहाँ यदि ] पूर्व नैमित्तिककर्तव्यता क्रतुके प्रति अङ्ग हो, तो उसमें कर्तव्यत्व आ सकता है, परन्तु क्रतुके प्रति उसके अङ्गत्त्वमें प्रमाण नहीं है, अतः पूर्वकी प्रसक्ति हो ही नहीं सकती है । और पश्चात् कालमें उत्पन्न होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदवाले क्रतुमें पूर्वकालमें उत्पन्न उद्गाताके अपच्छेदसे हुए प्रायश्चित्त अङ्ग नहीं है ] । ꕤ 'आवहनीये जुहोति' इस आवहनीयशास्त्रकी पदहोमातिरिक्त होममें ही जैसे विषयता है, वैसे ही 'यदि उद्गाता विच्छेद करे' इत्यादि शास्त्रकी भी पीछे कालमें होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदसे शून्य क्रतुमें विषयता है ।
न्यायरत्नमालामें कहा भी है—
'साधारणस्य शास्त्रस्य ०' प्रत्यक्षसिद्ध और होममात्रमें प्रवृत्त साधारणशास्त्र आहवहनीये जुहोति ( आवहनीय अग्निमें होम करे ) इत्यादिका 'पदे जुहोति' ( गौके सप्तम पादविक्षेपमें [सप्तम खुर जहाँ पड़ा हो, उसमें] होम करे ) इस
ꕤ 'आवहनीये जुहोति' इस शास्त्रका 'पदे जुहोति' इस वाक्यसे संकोच होता है, इसीको प्राप्तबाध कहा जाता है, इसका आगेके न्यायरत्नमालाके श्लोकमें विचार किया जायगा ।