सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 328, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें२९८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
ऽपीति—कृत्वाचिन्तामात्रपरम्। न तूत्तरनिमित्तोपजननात्प्राक्पूर्वनैमित्तिक- कर्तव्यता वस्तुत आसीदित्येवंपरम्, पूर्वग्रन्थसन्दर्भविरोधापत्तेः ।
कृत्वाचिन्तापरक है, उत्तरनिमित्तके उत्पन्न होनेसे पूर्व उसमें वस्तुतः कर्तव्यता थी, इस अर्थका प्रतिपादक वह ग्रन्थ नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे पूर्व ग्रन्थके साथ विरोध होगा * ।
* शास्त्रदीपिकाकारका वचन 'नैमित्तिकशास्त्रस्य०' (निर्णयसागरमुद्रित पुस्तकमें शास्त्रदीपिकामें 'नैमित्तिकशास्त्राणां ह्ययमर्थः' ऐसा पाठ उपलब्ध होता है, और इस ग्रन्थमें 'नैमित्तिकशास्त्रस्य' इत्यादिरूपसे पाठ उपलब्ध होता है, अतः अन्य पुस्तकोंमें कदाचित् एकवचनान्त पाठ भी होगा यह ज्ञात होता है) इत्यादिका उपन्यास इसलिए किया गया है कि दो रूपज्ञानके समान अर्थात् एक ही घटमें क्रमिक रूपद्वयज्ञान जैसे प्रामाणिक हैं, वैसे एक ही क्रतुमें क्रमिक नैमित्तिकप्रायश्चित्तद्वयज्ञान भी प्रामाणिक हो सकते हैं, अतः पूर्वसे परका बाध या परसे पूर्वका बाध करनेकी चिन्ता ही नहीं हो सकती है। इसपर सिद्धान्ती कहते हैं कि नहीं उक्त ग्रन्थका आपके मतानुसार अर्थ नहीं है, परन्तु उसका अभिप्राय कुछ दूसरा ही है। 'नैमित्तिकशास्त्रस्य' इत्यादि वाक्य उपसंहारभागमें पठित है, इसलिए उसका अभिप्राय उपक्रम ग्रन्थके अनुसार ही होगा और उपक्रमस्थ वाक्य है—'तेनोत्पन्नमपि' इत्यादि। इसका तात्पर्यार्थ यह है कि पहले शङ्का की गई कि जिस स्थलमें क्रमिक उद्गाता और प्रतिहर्ताका विभाग हुआ हो, वहाँपर पूर्वनिमित्तक ही प्रायश्चित्त करना चाहिए, क्योंकि उसका कोई विरोधी नहीं है, अतः अनायास उसका परिज्ञान हो जाता है। और उत्तरनिमित्तक प्रायश्चित्तका पूर्व- निमित्तक प्रायश्चित्तसे विरुद्ध होनेके कारण ज्ञान नहीं हो सकता है, इसलिए पूर्व ही बलवान् है। इस परिस्थितिमें 'तेनोत्पन्नम्' इत्यादिसे कहा कि यद्यपि पूर्वनैमित्तिकशास्त्रसे उस पूर्व प्रायश्चित्तकी अवगति होती है, तथापि वह बाधित होनेसे मिथ्या है। भाव यह है कि यद्युद्गातापच्छिन्द्यात्' इत्यादि प्रत्यक्षशास्त्रसे पूर्वनिमित्तक प्रायश्चित्तका ज्ञान होता है, परन्तु जो उत्तरनिमित्तक प्रायश्चित्तका ज्ञान है, वह अपनेसे विरुद्ध पूर्वज्ञानका बाध करके ही प्रवृत्त होता है, लोकमें भी 'शुक्तिरजतम्' और 'नेदं रजतम्' इत्यादिस्थलमें, ऐसा देखा गया है; अतः पूर्वज्ञान मिथ्या है, इसलिए वह बलवान् नहीं है। इस अवस्थामें 'तेनोत्पन्नमपि' इत्यादि उपक्रम ग्रन्थके अनुसार 'निमित्तोपजननं विना' इत्यादिका यही अर्थ होगा कि जिस क्रतुमें दो प्रकारके क्रमिक विरुद्ध अपच्छेद न हों, उस स्थलमें यदि द्वितीय निमित्तकी उत्पत्ति न हो, तो पूर्वनिमित्तके बलसे इस क्रतुका प्रयोग अन्य रीतिसे हो सकता है, परन्तु प्रकृतमें तो ऐसा है नहीं अर्थात् द्वितीय निमित्तकी उत्पत्ति हो गई है, अतः उत्तरनिमित्तक प्रायश्चित्तज्ञान पूर्वका बाध करेगा ही, इस प्रकार पूर्वनिमित्तसे अन्यथाकर्तव्यत्वकी क्रतुमें केवल संभावना होती है, वस्तुतः उसकी सत्ता निश्चित नहीं होती है कि अन्यथाकर्तव्य याग था, इसलिए शास्त्रदीपिकावचन भी दो ज्ञानोंमें प्रामाण्यका प्रतिपादक नहीं है, यह भाव है।
ज्योतिष्टोम यज्ञ सोमयागका ही प्रकार है 'ज्योतींषि स्तोमा यस्य सः=ज्योतिष्टोमः' इस