सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 33, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविधिविचार ] भाषानुवादसहित ५
वहन्ति' इति । अत्र विध्यभावेऽपि पुरोडाशप्रकृतिद्रव्याणां व्रीहीणां तण्डुलनिष्पत्त्याऽऽक्षेपादेवाऽवहननप्राप्तिर्भविष्यतीति न तत्प्राप्त्यर्थोऽयं विधिः, किन्त्वाक्षेपादवहननप्राप्तौ तद्वदेव लोकावगतकारणत्वाविशेषात् नखविदलनादिरपि पक्षे प्राप्नुयादिति अवहननाप्राप्तांशस्य सम्भवात् तदंशपरिपूरणफलकः ।
इसी भावको 'यथा' इत्यादिसे ग्रन्थकार कहते हैं] जैसे 'व्रीहीनवहन्ति' (व्रीहियों-का अवघात करे अर्थात् चावल निकालनेके लिए मूसलसे धानोंको कूटे ) ऐसा विधिवाक्य है । 'प्रकृतमें अवघातका विधान न भी किया जाय, तो भी व्रीहियोंका, जो पुरोडाशके प्रकृतिद्रव्य हैं, अवहनन तण्डुलनिष्पत्तिसे आक्षेप द्वारा ही प्राप्त हो जायगा, इसलिए अवघातकी अपूर्व प्राप्ति करानेके लिए यह विधि नहीं है। [ स्पष्टार्थ यह है कि दर्श और पूर्णमास यागमें आग्नेय आदि यागोंके उत्पत्तिवाक्यमें (आग्नेयोऽष्टाकपालो भवति) पुरोडाशद्रव्यका विधान किया गया है और उस स्थलमें यागका अनुवाद कर व्रीहियोंका भी विधान है। यद्यपि व्रीहि यागके साक्षात् साधन नहीं हैं, तो भी पुरोडाशके प्रकृतिद्रव्य होनेसे व्रीहियोंमें परम्परासे यागसाधनत्व है, क्योंकि व्रीहिसे उत्पादित चावलोंका बना हुआ पुरोडाश ही यागका साक्षात् कारण है। इसी प्रकार चावलकी उत्पत्ति अवघातके बिना नहीं हो सकती है, इसलिए वह तण्डुलोत्पत्ति भी अवश्य अपने अवघातरूप कारणका आक्षेप करेगी, क्योंकि अन्वय और व्यतिरेकसे चावलके उत्पादनमें अवघात कारणरूपसे निश्चित है, अतः 'व्रीहीनवहन्ति' विधिके बिना भी पूर्वोक्त प्रणालीसे व्रीहिका अवघात प्राप्त है, अतः उक्त वाक्य अपूर्व अर्थका प्रतिपादक नहीं हो सकता । यदि अवहनन लोकसे प्राप्त है, तो उसीसे नित्य प्राप्त हो ? इसपर 'किन्तु' इत्यादि-से कहते हैं] परन्तु जैसे तण्डुलनिष्पत्तिसे आक्षेप द्वारा अवहननकी प्राप्ति होगी, वैसे ही लोकमें [ चावल बनानेमें ] ज्ञात जो कारण हैं, उनके सामान्य होनेसे पक्षमें नखविदलन [ नखोंसे छिलना ] आदि भी प्राप्त होंगे, इससे अवहननके अप्राप्तांशका सम्भव होनेसे अप्राप्तांशकी परिपूर्तिके लिए यह 'व्रीहीनवहन्ति' नियमविधि है। [ अर्थात् पुरोडाशके लिए तण्डुलकी उत्पत्ति अवघातसे ही करनी चाहिए, न कि नखविदलनसे । इस नियमविधिसे