भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 590 में से

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पृष्ठ 331

प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित ३०१

आस्तां मीमांसकमर्यादा । श्यामतदुत्तररक्तरूपन्यायेन क्रमिककर्तव्यताद्वयोत्पत्त्युपगमे को विरोधः ?

उच्यते—तथा हि किं तत् कर्तव्यत्वम्, यत् परनैमित्तिककर्तव्यतोत्पत्त्या निवर्तेत । न तावत् पूर्वनैमित्तिकस्य कृतिसाध्यत्वयोग्यत्वम् । तस्य पश्चादप्यनपायात् । नापि फलमुखं कृतिसाध्यत्वम्, तस्य पूर्वमप्यजननात् । नापि यदननुष्ठाने क्रतोर्वैकल्यं तत्त्वम्, अङ्गत्वं वा । अननु-


थोड़ी देरके लिए मीमांसकोंकी *परिपाटी अलग ही रहे, श्यामरूप और उसके उत्तरकालमें उत्पन्न होनेवाले रक्तरूपके दृष्टान्तसे क्रमिक दो कर्तव्यताओंकी उत्पत्ति यदि मानी जाय, तो विरोध क्या है ? अर्थात् कुछ नहीं है ।

इसे कहते हैं—वह कौनसी कर्तव्यता है जो उत्तरकालीन नैमित्तिक कर्तव्यताकी उत्पत्तिसे निवृत्त होगी ? यदि कहो कि पूर्वकालीन निमित्तसे जायमान प्रायश्चित्तमें कृतिसाध्यताकी योग्यतारूप है, तो यह युक्त नहीं है, कारण कि उस कर्तव्यत्वकी अनुवृत्ति पीछे भी होती है † । और यदि कहो कि फलमुख कृतिसाध्यत्व ‡ कार्यत्व है, तो यह भी असङ्गत है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति पहले भी नहीं है । यदि कहो कि जिसके × अनुष्ठान न करनेसे


* तात्पर्य यह है कि घटमें पहले श्यामरूप रहता है, उत्तर क्षणमें पाकसे श्यामरूपका नाश और रक्तरूपकी उत्पत्ति जैसे होती है, वैसे ही उत्तरनैमित्तिक कर्त्तव्यकी उत्पत्तिसे विनष्ट होनेवाला यदि पूर्वनिमित्तक कर्तव्यत्व माना जाय, तो उस कर्तव्यत्वका निरूपण प्रथम करना चाहिए और वह अशक्य है, इसी बातको मूलमें 'उच्यते' इत्यादिसे कहते हैं ।

† अर्थात् उत्तरकालीन प्रायश्चित्तके कर्त्तव्यत्वकालमें भी उक्तलक्षणलक्षित पूर्वनिमित्तक कर्त्तव्यत्वकी अनुवृत्ति होती है, अतः उत्तरकालीन कर्त्तव्यतासे पूर्वकालीन कर्तव्यताका विनाश हो ही नहीं सकता, इसलिए 'घेर' के श्याम और रक्तरूपके समान उन कर्तव्यताओंमें क्रमिकत्वका स्वीकार नहीं कर सकते हैं, यह भाव है ।

‡ फलमुखकृतिसाध्यत्वका अर्थ है—फलोन्मुखकृतिसाध्यत्व, फल—कार्य उससे उन्मुख—युक्त अर्थात् कर्तव्यत्व उसे कहते हैं जो कृतिसाध्य होकर उत्पत्तिसे युक्त हो, प्रकृतमें यह नहीं है, क्योंकि उस कर्तव्यत्वकी उत्पत्ति पहले भी नहीं हुई है, जब उसकी उत्पत्ति हो, तब उसमें फलमुखकृतिसाध्यत्व रहे, परन्तु ऐसा है नहीं । इस अवस्थामें पूर्वनैमित्तिक ज्ञानमें अप्रमत्व ही मीमांसकोंके अनुसार सिद्ध होता है, श्याम और रक्तरूपके समान प्रमात्व सिद्ध नहीं होता है । इसलिए कर्तव्यताद्वय प्रमाण सिद्ध नहीं है, यह भाव है ।

× जिसके अनुष्ठानाभावसे क्रतुमें कुछ न्यूनता हो अर्थात् क्रतुके वैकल्यमें प्रयोजक अनुष्ठानके प्रतियोगीभूत अनुष्ठानका जो आश्रय हो, वह कर्तव्य है । जहाँ प्रथम उद्गाताका