सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 335, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार ] भाषानुवादसहित ३०५
विरुद्धापच्छेदशास्त्रयोः पदाहवनीयशास्त्रवद् व्यवस्थोपपत्तेः । तस्मान्निरालम्बनं क्रमिककर्तव्यताद्वयोत्पत्तिवचः ।
ननूपक्रमवत् पूर्वं प्रत्यक्षं बलवच्छ्रुतेः ।
नैकवाक्येष्विदंवाधास्त्वपच्छेदनयादिह ॥१२॥
यदि यह शङ्का हो कि उपक्रमके समान प्रत्यक्ष पूर्वभावी है, अतः श्रुतिसे प्रत्यक्ष बलवान् है, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि परस्पर एकवाक्यता स्थलमें ही उपक्रम-न्यायसे पूर्व बलवान् होता है, यहाँ तो अपच्छेदन्यायसे प्रत्यक्षसे पर श्रुति ही बलवती है ॥ १२ ॥
ननु चोपक्रमाधिकरणन्यायेनाऽसञ्जातविरोधित्वात् प्रत्यक्षमेवाऽऽगमाद् बलीयः किं न स्यात् ?
उच्यते—यत्रैकवाक्यता प्रतीयते, तत्रैकस्मिन्नेवार्थे पर्यवसानेन भाव्यम्, अर्थभेदे प्रतीतैकवाक्यताभङ्गप्रसङ्गात् । अतस्तत्र प्रथममसञ्जातप्रतिपक्षेण
अब शङ्का होती है कि उपक्रमाधिकरणन्यायसे असञ्जातविरोधी ॐ होनेके कारण प्रत्यक्ष ही आगमसे बलवान् क्यों न होगा ? अर्थात् आगमकी अपेक्षा प्रत्यक्ष ही बलवान् है । [ तात्पर्य यह है कि जैसे उपक्रमवाक्यके अर्थज्ञानके समयमें उपसंहारवाक्यार्थका परिज्ञान न होनेसे किसी विरोधीका परिस्फुरण नहीं होता है, अतः उपक्रम असञ्जातविरोधी है, वैसे ही द्वैतमें सत्यत्वके प्रत्यक्ष-समयमें विरोधी अर्थ, अर्थात् द्वैतमिथ्यात्वग्राहक श्रुतिका अर्थ, अनुभूत नहीं होता है, अतः विरोधकी परिस्फूर्ति न होनेसे प्रत्यक्ष असञ्जातविरोधी है, इस-लिए वह बलवान् हो सकता है । ]
इस आक्षेपके समाधानमें कहते हैं कि जहाँपर एकवाक्यता प्रतीत होती है, वहाँ एक ही अर्थमें वाक्यका पर्यवसान होता है, यदि ऐसे स्थलमें अर्थभेद माना जाय, तो प्रतीत एकवाक्यताका भङ्ग होगा [ अर्थात् भिन्न-भिन्न अर्थोंके रहते एकवाक्यताका ज्ञान नहीं हो सकता है, अतः एकवाक्यतामें--उपक्रम
ॐ उपक्रमाधिकरणन्यायसे उपक्रम ही बलवान् होता है, क्योंकि उपक्रम—आरम्भ जब होता है, तब अन्य विरोधी नहीं होता, अतः इसी उपक्रमन्यायसे प्रत्यक्षके असञ्जातविरोधी-( न सञ्जातो विरोधो यस्य सः, अर्थात् जिसका प्रतिद्वन्द्वी उत्पन्न न हुआ हो ) होनेसे शब्दकी अपेक्षा वही बलवान् होगा, प्रत्यक्ष जब प्रवृत्त होगा, तब मिथ्यात्वबोधक श्रुतियोंकी प्रवृत्ति न होनेके कारण वह असञ्जातविरोधी है ही ।
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